जब जे’ल गया 2 माह का था बेटा, 22 साल बाद पिता के सीने से लिपटा तो जे’लर के भी छलक गए आंसू

जब जे’ल गया 2 माह का था बेटा, 22 साल बाद पिता के सीने से लिपटा तो जे’लर के भी छलक गए आंसू

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रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में बंद 58 कै/दी गुरुवार को रिहा कर दिए गए। झारखंड राज्य सजा पुनरीक्षण पर्षद की अनुशंसा पर सीएम की स्वीकृति के बाद ये कै/दी रिहा किए गए। रिहा किए गए सभी कै/दी ह/त्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पाने वाले हैं जो कम से कम 14 साल की सजा पूरी कर चुके हैं। जेल से रिहा होते ही सभी कैदी अपनों से मिले। किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी की पत्नी लेने पहुंची थी। अपनों से मिल सभी के आंसू छलक उठे थे। इनमें दो ऐसे कै/दी भी रिहा हुए, जो अपना पता भूल चुके हैं। इनमें गुमला निवासी एतवा खडिय़ा और गढ़वा निवासी लखन भुईयां हैं। इन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे कहां जाएं। बाद में संबंधित जिले के अन्य कैदियों के साथ वाहन में बैठाकर भेजा गया। उनके जिले के अन्य कैदियों ने उन्हें घर छोडऩे की बात कह साथ ले गए। दोनों ने बताया कि वे 25 से 30 साल से वे जे/ल में थे। उनसे मिलने कोई जे/ल नहीं आता था।

रिहा हुए कै/दियों में एक ऐसा है, जो हत्या के केस में जे/ल गया तब दो माह के बेटे को छोड़ा था। कैदी खूंटी निवासी निताई मुंडा है। उसका बेटा घसिया मुंडा पिता को लेने पहुंचा था। 22 साल बाद वह पिता को छुड़ाने के लिए जेल पहुंचा था। बेटे को देख वह एकटक होकर देखता रहा। पिता और बेटा दोनों की आंखों में आंसू छलक उठे थे।रिहा हुए कै/दियों में एक कैदी की कहानी अजीब है। ह/त्या के मामले में जब वह जेल जा रहा था, तब शादी के एक साल हुए थे। जेल जाने के बाद पत्नी छोड़ गई। दूसरे के साथ शादी रचा ली। इसी तरह सभी की अलग-अलग कहानियां हैं। महेंद्र सिंह ने पत्नी की ह/त्या कर दी थी।

गुमला निवासी कैदी किस्तो उरांव ने जेल के भीतर रहकर बड़ा काम किया है। जेल के भीतर मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार को पैसे भेजता रहा। इससे पत्नी पैसे को बचाकर रहने लायक घर बना ली। घर वाले उनसे मिलने जब आते थे, तब जरूरत के पैसे ले जाया करते थे। जबकि अन्य कै/दियों के परिजन पैसे देने के लिए जेल गेट पर पहुंचते हैं। जे/ल पहुंचकर उनकी जरूरतों के लिए पैसे लिया करते थे।

बंदियों में हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, नवादा, गिरिडीह, दूमका, जामताड़ा, गुमला के लोग शामिल थे। ज्ञात हो कि एक नवंबर 2019 को बोर्ड की बैठक में इन बंदियों की समीक्षा की गई थी। समीक्षा के उपरांत इन्हें छोडऩे का निदेश जारी किया गया था। इनमें राधा महली नागफेनी गुमला, विजय लाल वर्णवाल कतरास धनबाद, बाबुलाल उर्फ बाबुधन मुर्मू दूमका, चुनका बास्की बोरियो साहिबगंज, दासो मियां जामताड़ा, मुंशी महतो कोडरमा, महाबीर रजक काशीचक नवादा, गुड्डू पांडेय गोमिया बोकारो, तेजो साव रसोईया धमना चौपारण, विश्वनाथ रवानी, धनबाद, नयन महतो बोकारो, लालमोहन महतो जरीडीह बोकारो, जीतलाल महतो बोकारो, होरिल पंडित गिरिडीह, बुधन पंडित गिरिडीह, वशिष्ठ साव बोकारो, सदीक मियां कटकमसांडी हजारीबाग, मोती राम बेसरा टुंडी धनबाद, मैनेजर करमाली मांडू, राजेंद्र यादव जमुआ गिरिडीह, रामचंद्र राय, धनवार, मो. इम्तियाज सदर हजारीबाग, बिरजू भुईंया रामगढ़, बब्लू साव बोकारो शामिल हैं।

चाईबासा के जेल अधीक्षक जितेंद्र कुमार ने बताया कि झारखंड राज्य पुनरीक्षण पर्षद की अनुशंसा पर मुख्यमंत्री ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे राज्य के विभिन्न जेलों में बंद कुल 139 बंदियों को रिहा करने के लिए अपनी स्वीकृति दी थी। इनमें चाईबासा मंडलकारा के ये तीन बंदी भी शामिल थे। ऊपर से आदेश आने के बाद गुरुवार को चक्रधरपुर के श्याम केराई, बुधन केराई व मंझारी के किती बिरुवा को रिहा कर दिया गया है। मालूम हो कि उमक्रैद की सजा काट रहे कैदियों को चाईबासा जेल से संभवत: पहली बार समय पूर्व रिहा किया गया है।

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