आपको लगता है कि बिहार विधानसभा का आगामी चुनाव होने तक BJP-JDU साथ रहेंगे? मुझे तो नहीं लगता

आपको लगता है कि बिहार विधानसभा का आगामी चुनाव होने तक BJP-JDU साथ रहेंगे? मुझे तो नहीं लगता

विमलेन्दु सिंह

क्या आपको लगता है कि बिहार विधानसभा का आगामी चुनाव होने तक भाजपा और जदयू साथ रहेंगे? मुझे तो नहीं लगता। इसकी कुछ खास वजह है। सबसे पहली बात तो यह है नीतीश कुमार किसी भी स्थिति में भाजपा से कम सीट पर चुनाव ल/ड़ना स्वीकार नहीं करेंगे।

वैसे सौदेबाजी में लोजपा का भी कोई जवाब नहीं ।लोजपा की राजनीतिक हैसियत चाहे जैसी भी हो पर हक की ल/ड़ाई में जरा भी समझौता इसे बर्दाश्त नहीं। तो क्या भाजपा नुकसान झेलकर जदयू और लोजपा का साथ सहन कर पाएगी? शायद नहीं। और शायद हाँ भी क्योंकि यह उसकी मजबूरी है।

एक बात और है। भले ही भाजपा सीएम पद के लिए नीतीश कुमार के नाम पर अभी सहमति जता रही हो लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा के नेता इस त्याग को अंगीकार कर दधीचि बनना स्वीकार नहीं करेंगे। आखिर भाजपा के दूसरे नेताओं में मुख्यमंत्री बनने की इच्छा भी तो कुलांचे मार रही हैं।

अब आइए जरा विपक्ष की ओर रुख करते हैं। गठबंधन में तो खींचतान तो पहले से जारी है। ए/क्सीडेंटल चीफ मिनिस्टर रहे जीतन राम मांझी भला क्यों नहीं बिहार का सीएम बनना चाहेंगे? उपेंद्र कुशवाहा के भी मन में तो यही इच्छा कुलबुला रही है वर्षों से।

उपचुनाव में बागी तेवर दिखा चुके वीआईपी नेता मुकेश साहनी की चाहत फिलहाल ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव ल/ड़ने और जीतने की होगी। और शायद अपने करीबी कई लोगों को मंत्री पद पर और स्वयं को डिप्टी सीएम के पद पर देखने की होगी।

राजद सहयोगी दलों के इतने नखरे शायद झेल नहीं पाएगा। क्योंकि राजद के लिए ‘एको तेजस्वी द्वितीयो नास्ति’ सबसे महत्वपूर्ण है। ‘तेजस्वी नाम केवलम’ राजद का सूत्र वाक्य ही समझिए। तो उम्मीद क्या है?

लालू प्रसाद के लिए सबसे बड़ी चिंता और चुनौती अपने पुत्रों को राजनीति के रेस में प्रासंगिक बनाए रखने की होगी। उनकी प्रासंगिकता कायम रखने की होगी।यह तभी संभव हो पाएगा जब राजद ज्यादा से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करे। भाजपा और जदयू के साथ रहते तो ऐसा मुमकिन नजर नहीं आ रहा है।

तो क्या होगा? आइए कुछ संभावनाओं को टटोलें। क्या तेजस्वी एक बार फिर से डिप्टी सीएम के उम्मीदवार बनेंगे? मुमकिन है। आखिर राजनीति संभावनाओं का ही तो खेल है। तो इंतज़ार कीजिए और चुनाव की तारीख नजदीक आने दीजिए।

बिहार की राजनीति में द/म तोड़ चुकी पार्टी कांग्रेस वह नैया है जो बिना किसी तिनके के सहारा लिया अपनी नैया पार नहीं लगा सकती। बात सीट पर अटकेगी। तेजस्वी को बिहार में सीएम का चेहरा स्वीकारने पर अटकेगी।

जदयू और राजद अगर जुड़ गए तो कांग्रेस हम, रालोसपा और वीआईपी के साथ जुड़ थर्ड फ्रंट बना सकती है। ऐसे में जाप भी इसमें शामिल हो सकते हैं। लेकिन पप्पू यादव के सीएम बनने की महत्वाकांक्षा की आप अनदेखी कैसे कर सकते हैं?

और अगर जदयू-भाजपा गठबंधन कायम रहा तो राजद-कांग्रेस-हम-वीआईपी-रालोसपा का गठजोड़ त्याग और ब/लिदान की दुहाई देते हुए एक दूसरे का हाथ थामे रह सकते हैं।देखने वाली बात यह होगी कि क्या तब जाप को इस गठबन्धन में जगह मिल पाती है? वैसे वाममोर्चा को साथ रखने की कोशिश जरूर होगी।

यह तो तय है कि जदयू ज्यादा सीट मांगेगी। क्या भाजपा नीतीश के इस तेवर को बर्दाश्त कर लेगी। क्या भाजपा नेता चुपचाप नीतीश को सीएम बनाने की मुहिम में स्वयं को झोंक देंगे? यह इतना आसान लगता नहीं है।

भाजपा नेता भी सीएम बनने की भूख में छटपटा रहे हैं। सुशील मोदी, गिरिराज सिंह, अश्विनी चौबे, नित्यानन्द राय, शाहनवाज हुसैन और भी कई सीएम इन वेटिंग बन टकटकी लगाए बैठे हैं और पार्टी के वफादार सिपाही बन अपनी बारी और पार्टी के आदेश का इंतज़ार कर रहे हैं। ऐसी इच्छा जब ज्यादा बलवती होगी तो बीजेपी-जदयू गठबन्धन दोफाड़ होने की गुंजाइश बढ़ जाएगी।

अंधा क्या चाहे? दो आँख! लालू जी तो इसी इंतज़ार में बैठे हैं। ऐसी स्थिति में एक बार राजद-जदयू गठबन्धन की संभावना बनेगी। छोटका भैया और बड़का भैया सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन की अदाकारी दिखाने मंच पर विराजमान होंगे।

लालू शायद ही नीतीश कुमार को सीएम फेस स्वीकार करने में हिचकें। क्योंकि जदयू का साथ मिलते ही राजद की मजबूती कई गुना बढ़ जाएगी। जाहिर तौर पर जदयू की भी। इसके बाद दोनों दल फिर से फिफ्टी-फिफ्टी खेलने मैदान में होंगे।

हालांकि लोजपा के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। लेकिन लोजपा वह ऊँट है जो किसी भी करवट बैठ सकता है। मांझी, कुशवाहा और सहनी की किसी को परवाह नहीं होगी। इन्हें बैकफुट पर आना होगा। जिद पर अड़े रहे तो जाएंगे और फिर पछताएंगे।

बात अगर भाजपा की करें तो अकेले भाजपा बिहार में कुछ नहीं कर पाएगी। और भाजपा-जदयू मिलकर अगर चुनाव लड़ गए तो राजद कुछ नहीं कर पाएगा। तब तो नीतीश कुमार ही सीएम होंगे।अगर भाजपा उन्हें कहीं की गवर्नरी के लिए या वाइस प्रेसीडेंट कैंडिडेट जैसे लॉलीपॉप पर एग्री करवा ले तो अलग बात है। वैसे इसकी उम्मीद कम है।

कुल मिलाकर बल्ले-बल्ले तो बस नीतीश कुमार की ही है। गठबन्धन भाजपा के साथ कायम रहे तो और राजद के साथ फिर एक बार एग्रीमेंट पक्का रहा तो, दोनों ही स्थिति में अगले सीएम के तौर पर नीतीश कुमार ही बड़े दावेदार के तौर पर उभर कर फिर से सामने आ रहे हैं। वैसे भी तेजस्वी यादव, जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा, पप्पू यादव, गिरिराज सिंह, अश्विनी चौबे एवं अन्य संभावित मुख्यमंत्रियों के बीच सर्वाधिक संभावना तो वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ही है। फिर से…फिर से….!

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