EXCLUSIVE : दीपक चौरसिया को बचाने वाले भी शाहीन बाग के आंदोलनकारी थे

EXCLUSIVE : दीपक चौरसिया को बचाने वाले भी शाहीन बाग के आंदोलनकारी थे

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आप मीडियाकर्मी सच में चाहते हैं कि आप पर ह/मले न हो ?

शाहीनबाग में कवरेज के दौरान न्यूज नेशन चैनल के मीडियाकर्मी दीपक चौरसिया के साथ हा/थापाई हुई. कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें रोकने की कोशिश की गयी जिसे कि चैनल ह/मला बता रहा है. मेरा मानना है कि ह/मला, हा/थापाई, ब/दसलूकी क्या, उन्हें अपना काम करने देने से किसी भी तरह से रोका गया, परेशान किया गया तो भी वो उतना ही गलत है. इस बात के प्रति हमें गंभीर होना चाहिए कि एक मीडियाकर्मी क्या, पटरी किनारे डुप्लीकेट चाबी बनानेवाले, ब्रेड-अंडे बेचनेवाले को भी कोई किसी तरह से परेशान करता है, ज्यादती की जाती है तो वो हमारे नागरिक समाज का संकट है. ऐसी खबरों से लोगों के प्रति असुरक्षा की भावना पनपती है और गैरज़रूरी ढंग से आशंका का माहौल बनता है. खैर

इस घटना की चौतरफा निंदा हो रही है. हमारे कुछ ऐसे भी भूतपूर्व मीडियाकर्मी हैं जो पचास तरह के अंड-बंड कामों में एक साथ फंसे हैं, सेलेक्टेड चुप्पी साध लेनेवालों की लिस्ट बनाने में जुटे हैं. संभव है कि उन सबों को हिं/सा समर्थक घोषित कर दिया जाय. अच्छी स्थिति यह है कि ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है जो पत्रकारिता के नाम पर दीपक चौरसिया जो कुछ भी कर रहे हैं, उन्हें सिरे से नकारकर लोकतंत्र का खतरा मानते आए हैं, उन्होंने भी इस घटना की बिना इफ-बट किए निंदा की है. एक संवेदनशील और लोकतंत्र के मूल्यों में यकीं रखनेवाला नागरिक ऐसा ही करेगा. उनके लगातार अपडेट किए जाने से कम से कम सोशल मीडिया पर ऐसा माहौल तो जरूर बन गया कि यह सवाल महज दीपक चौरसिया का नहीं है, उस प्रत्येक मीडियाकर्मी का है जो जहां से रिपोर्टिंग कर रहा है, वहां के माहौल से अलग और विपरीत अपनी बात रखना चाहता है, उसके लिए संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी. ऐसे में तो पत्रकारिता की धार कुंद हो जाएगी.

इधर दीपक चौरसिया के समर्थक जो कि वाया एक खास किस्म की राजनीति के कारण अपने को ज्यादा करीब पाते हैं, इस घटना को ह/मला और लोकतंत्र पर खतरा बताने में तो बहुविध तरीके से कोशिश कर ही रहे हैं. उनका ऐसा किया जाना जरूरी भी है. उनके लिए यह महज एक मीडियाकर्मी के साथ हुई घटना न होकर उस राजनीतिक घेरेबंदी के दरकने का संकेत ज्यादा है जिनके संरक्षण में पत्रकारिता के नाम पर पक्ष में जनमत निर्माण का कार्य होता आया है. खैर

इस घटना के लगभग बीस घंटे होने जा रहे हैं. मैं बारी-बारी से न्यूज नेशन और दीपक चौरसिया की ट्विटर-फेसबुक टाइमलाइन पर गया. टाइमलाइन के अनुसार इससे जुड़ी घटना के अपडेट किए सोलह घंटे हो गए लेकिन कहीं भी एक पंक्ति में भी ये ख़बर नहीं है कि जिस शाहीनबाग में उनके साथ ये घटना हुई, उसी शाहीनबाग में चल रहे विरोध-प्रदर्शन के मंच से आधिकारिक तौर पर इस घटना की निंदा की गयी. यहां यह बात लिखने के अपने खतरे हैं कि इसका मतलब है कि हम जैसे लोग मीडियाकर्मी के साथ न होकर प्रदर्शनकारियों और आगे चलकर हमलावरों के साथ हैं. लेकिन

मुझे ऐसा लिखना इसलिए भी जरूरी लग रहा है कि किसी भी मीडियाकर्मी पर जैसे ही ह/मले की ख़बर प्रसारित होती है और घटना यदि दिल्ली से जुड़ी हो, आम नागरिकों के दिमाग में बुनियादी तौर पर दो सवाल उठते हैं- एक तो ये कि पत्रकार पर जब ह/मले हो सकते हैं ( दीपक चौरसिया जैसे मीडियाकर्मी वैसे बा/उंसर लेकर चलते रहे हैं ) तो फिर आम नागरिक कितना सुरक्षित है ? और दूसरा कि जब दिल्ली में यह स्थिति है तो देश के बाकी हिस्से में क्या हालत होती होगी ?

इस सवाल के साथ यह बात उनके बीच कभी नहीं जाती कि दिल्ली में जहां ये घटना होती है, उसी नागरिक समाज के लोग इसकी निंदा करते हैं, सुरक्षा घेरा बनाकर मीडियाकर्मी को बाहर निकालते हैं, उन्हें आश्वस्त करते हैं कि आप अकेले नहीं हो.

आपको मेरी इस बात पर यकीं न हो तो जितने पोर्टल/ वेबसाइट ने इस घटना पर अपडेट किए हैं, कोई चैनल के संपादक-एंकर-दीपक चौरसिया से जाकर बातचीत करे कि जब आप पर ह/मला हुआ ( ये उनके और चैनल के शब्द हैं ) तो स्वाभाविक है, आपको डर लगा होगा. ऐसे में आपको किन लोगों ने सुरक्षित बाहर निकाला, वहां के लोगों ने आपकी मदद की या नहीं ? अभी उनकी और चैनल की टाइमलाइन पर सिरे से जो चुप्पी है, वो शर्तिया तौर पर भंग होगी. लेकिन नहीं.

ये ख़बर यदि चैनल या दीपक चौरसिया की तरफ से आ जाय तो अब तक ह/मले की बात के साथ जो माहौल बनाया है, वो अपने आप पंक्चर हो जाएगा. लोगों के दिमाग में ये बात तुरंत चली जाएगी कि जिस जगह पर यह घटना हुई, वहां समझदार और बेहतर इंसान मौजूद रहे और मदद करने में तत्पर नज़र आए. जाहिर है, इससे उनके भीतर जो ह/मलेवाली ख़बर से डर पैदा हुआ है, वो कम होगा. उनके भीतर एक पक्ष यह भी रहेगा कि ऐसा नहीं है कि कोई किसी मीडियाकर्मी पर हमला करके चला जाय और लोग तमाशबीन बने रहेंगे.

सवाल सिर्फ ये नहीं है कि मीडियाकर्मियों पर ह/मले हो रहे हैं, उन्हें कवरेज के दौरान प्रदर्शनकारी परेशान कर रहे हैं. सवाल ये भी है कि वो कौन लोग हैं जो ऐसी घटना होने पर इसकी निंदा करते हैं, फौरी तौर पर मीडियाकर्मी की मदद करते हैं और सुरक्षित होने का एसहास पैदा करते हैं ? उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि पत्रकारिता के नाम पर लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने के बजाय तार-तार करने में लगे रहे मीडियाकर्मियों की भी मदद करना उतना ही जरूरी है ?

न्यूज चैनल जो स्टूडियो से लगातार नागरिक समाज को दं/गाई भीड़ में बदल दे रहे हैं, ऐसी भीड़ जो इस हद तक हिंसक होती जा रही है कि किसी दिन अपने ही शरीर के अंग को काटकर अपने से अलग करने लग जाय और दूसरी तरफ सड़कों पर उतर आए लोगों को दुराग्रहवश दं/गाई साबित करने में जुटे हैं, इन दोनों ही स्थिति में नागरिक की चिंता कहां बचती है, ये सवाल कौन करेगा ?

मैं दीपक चौरसिया क्या देश के किसी भी नागरिक पर ह/मला करने, उन्हें परेशान करने और हिसाब चुकता करने के नाम पर कानून हाथ में लेने के खिलाफ हूं. मैं अपनी टाइमलाइन पर अक्सर लोगों को टोकता भी रहता हूं. कई बार हिं/सात्मक बातें करनेवाले लोग लोकतंत्र की चिंता में ही लिख रहे होते हैं. लेकिन

चैनल और मीडियाकर्मी सालभर लगातार तमाम तरह के धत्तकर्म करते हुए इस बात को लेकर आश्वस्त रहे कि लोग उन्हें नकारने लग जाएंगे तो ऐसी घटना के ज़रिए क्रेडिबिलिटी वापस आ जाएगी. यदि सचमुच ऐसा है तो आपको लगता है कि उनके दिमाग में एक सुरक्षित लोकतंत्र की परिकल्पना है ? जो घटना आपके लिए एक गंभीर बात होनी चाहिए, उसे आप लोकतंत्र के खिलाफ काम करते हुए भी पर्दा डालनेवाले साधन के तौर पर लेने लग जाते हैं तो ये रवैया कब तक चलेगा ? जिन लोगों ने आपके साथ ऐसा किया, उन पर कानूनी कारवाई किए जाने की मांग, उनके अपडेट्स अपने दर्शकों तक पहुंचाने के बजाय आपका पूरे-पूरे नागरिक समाज को दुराग्रह के साथ लेबलिंग करना किस तरह से जायज़ है ? क्या ऐसा करके आप पत्रकारिता की बुनियादी शर्तों से अपने आप को काटकर अपने दर्शकों को हिंसक और दिमाग रूप से बंद नहीं बना दे रहे हैं ?

क्या एक दिन ऐसा नहीं आएगा जब आपकी ओर से किए गए स्टिंग ऑपरेशन पर लोग भरोसा करने के बजाय राजनीतिक दलों के बीच का प्रोपेगेंडा मानने लग जाएं ? क्या इस स्थिति में संवेदना के स्तर पर लोग आपसे कटने नहीं लग जाएंगे और यह कम खतरनाक स्थिति होगी ? अपनी साख पर हमले की कोटिंग का फॉर्मूला कब तक काम करेगा ?

क्या यहां यह जरूरी नहीं है कि इतर इस घटना को लेकर दूसरे सिरे से सोलह घंटे की चुप्पी के बजाय इस बात पर भी ख़बर होती कि लोग अभी भी इतने अमानवीय नहीं हुए हैं कि अपने नागरिकों को, मीडियाकर्मियों को बचाने के लिए आए न आएं.

मेरी ये बात आपको शाहीनबाग के पक्ष में खड़े होने का संकेत देगी लेकिन कल को ये शाहीनबाग के बजाय चांदनी चौक, नत्थूपुरा, मुनिरका या फिर देश का कोई भी गंज, बाद, पुर हो जाय तो भी आप तक दोनों सिरे से बात जाएगी कि उ/त्पातियों के बीच शांति, अहिंसा और इंसानियत के लिए आगे आनेवाले लोग कम नहीं हुए हैं. आप इस पक्ष को नकारते रहेंगे तो आप ख़ुद भी पत्रकारिता और लोकतंत्र के खिलाफ करार दे दिए जाएंगे.

Vineet kumaar

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