वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर के नाम खुला पत्र, राजसभा टिकट के लिए इतनी ‘च/मचागिरी’ ठीक नहीं

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर के नाम खुला पत्र, राजसभा टिकट के लिए इतनी ‘च/मचागिरी’ ठीक नहीं

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आदरणीय वरिष्ठ पत्रकार महोदय प्रणाम। आशा करता हूं आप ठीक होंगे और स्वस्थ होंगे। श्रीमान मैं आपको पिछले 8 सालों से फेसबुक पर फॉलो कर रहा हूं। कुछ समय पहले तक मैं आपकी फ्रेंड लिस्ट में भी था। समय-समय पर आपको पढ़ता रहता हूँ। अपनी क्षमता अनुसार अगर किसी पोस्ट पर जानकारी होती हैं तो कमेंट भी करता हूँ । आपने भी कई बार मेरे कमेंट का जवाब दिया है।श्रीमान सच में यह देश बदल रहा है। इस देश के नागरिक बदल रहे हैं। परिवार का हर एक सदस्य बदल रहा है। पत्रकार बदल रहा है। कलाकार बदल रहा है। एक तरह से कहा जाए तो पूरा देश या तो मोदी समर्थक हो गया है या तो मोदी वि’रोधी हो गया है। विपक्ष ना होने के कारण जनता सड़कों पर उतर कर खुद आंदोलन कर रही है। मुझे जहां तक जानकारी है पत्रकारिता का आरंभ करने से पहले आप एक राजनीतिक दल का सदस्य हुआ करते थे। इस बात का उल्लेख आपने खुद कई बार किया है।

अब मुद्दे की बात करते हैं कुछ दिन पहले सदन में कैब अर्थात सीएए लागू हुआ है। इस बिल के माध्यम से तीन देश के अल्पसंख्यक, एक तरह से कहा जाए तो मु/सलमानों को छोड़कर हर ध/र्म के लोगों को भारत की नागरिकता देने की व्यवस्था की गई है। इस बिल के पास होने के बाद पूरे देश में हो ह/ल्ला हो रहा है। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि मैं आपको फॉलो करता हूं और पढ़ता हूं। इस बिल पर एक तरह से कहा जाए तो आप इसका पुरजोर समर्थन करते हैं। अपनी कलम के माध्यम से आप साबित करते हैं कि इस बिल का विरोध राजनीतिक योजना के तहत किया जा रहा है। श्रीमान 1 मिनट रुकिए और सोचिये क्या आप सच है। आपको नहीं लगता कि आप से कहीं ना कहीं गलती हो रही है। अगर सीएए और एनआरसी का संबंध ना भी हो तो भी इस बिल का पुरजोर विरोध होना चाहिए। हमारे देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष होने की बात करता है। तो फिर कैसे ध/र्म आधारित कानून बनाए जा सकते हैं। क्या आपको नहीं लगता की नागरिकता लेने का अधिकार विश्व के हर एक नागरिक का है। यह निर्भर करता है उस सरकार के ऊपर कि वह उस आवेदन कर्ता को नागरिकता देती है या नहीं।

श्रीमान आज आपने एक फेसबुक पोस्ट लिखा है इसमें आपने कहा है कि कि प्रणब मुखर्जी पूर्व राष्ट्रपति 2013 में अन्ना आंदोलन के दौरान जो बोल रहे थे उसके साफ उलट आज शाहिनबाग आंदोलन पर बोल रहे हैं।महाशय क्षण भर के लिए आपकी बातों से सहमत हुआ जा सकता है। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि सत्ता विपक्ष में आते ही अपने सुर बदल लेती है। उसी तरह से विपक्ष सत्ता में जाते ही सुर बदल लेता है।आपने प्रणब मुखर्जी का उदाहरण दिया है। जबकि वर्तमान समय में भारत के सबसे प्रसिद्ध नेता और हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयानों का आप आकलन करते तो आप पाते कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी और भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दूसरे के साफ विरोधी है। एक तरह से कहा जाए तो एक पूरब है तो दूसरा पश्चिम है।

गुजरात का सीएम जहां आधार कार्ड का विरोध करता था, जहां डॉलर और रुपए पर केंद्र सरकार को खरी-खोटी सुनाता था, रोजगार को लेकर केंद्र सरकार को आड़े हाथ लेता था । वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सब पर चुप्पी साधे रहते है। महाशय मेरे कहने का अर्थ साफ है कि एक महिला का बेटा अगर चोर हो और दूसरी महिला का बेटा भी चोर हो तो पहले या दूसरे का समर्थन इसलिए नहीं किया जा सकता है कि दोनों का बेटा चोर है। चोर तो चोर होता है न। तो आखिर साधु किसी एक को कैसे मान लिया जाए।

महाशय नागरिकता कानून के बारे में आप कितना जानते हैं या नहीं जानते हैं यह मुझे नहीं पता, लेकिन अगर इस देश में एनआरसी लागू होती है साफ मानिए आपको लाइन में लगना होगा। आपके गांव के हजारों लोगों को परेशान होना होगा। दिल पर हाथ रख कर बताइए कि आपके गांव में कितने अवैध बांग्लादेशी रहते हैं और अगर एक भी विदेशी नागरिक नहीं है तो उस गांव में एनआरसी क्यों। अगर एनआरसी लागू भी होती है तो क्या आपके गांव में शत-प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिनके नाम पर अपनी जमीन है। क्या आपके गांव में ऐसे दलित या महादलित परिवार हैं जो सरकारी जमीन पर घर बनाकर रहते हैं लेकिन आज तक उनके नाम पर रजिस्ट्रीनहीं है। क्या आपके गांव में ऐसे लोग हैं जो आपकी खेतों में काम करते हैं, आप ने उन्हें रहने के लिए जमीन दी हुई है और आज भी वह जमीन आपके नाम पर है।

महाशय अगर सीएए -एनपीआर और एनआरसी एक दूसरे का पूरक है तो फिर आप ही बताइए आपके गांव में आधार कार्ड, वोटर कार्ड और राशन कार्ड के अलावे कितने परिवार हैं जो कागज के दम पर यह साबित कर पाए कि वह भारत का नागरिक है। चलिए यह भी मान लेते हैं कि सारे के सारे परिवार के पास डॉक्यूमेंट है। वह एनआरसी सेंटर पर जाते भी हैं और डॉक्यूमेंट जमा कर आते भी हैं तो, इसकी क्या गारंटी है कि मानवीय भूल के कारण उन्हें परेशान नहीं होता होगा।मानवीय भूल से मेरा अर्थ यह है कि अगर सुरेंद्र किशोर अपना कागज जमा कराते हैं उनका नाम एनआरसी में आ जाता है और उनकी पत्नी का नाम नहीं आता है। मान लेते हैं कि दावा में पत्नी का नाम आता है और बेटे का नाम नहीं आता है तो ऐसी परिस्थिति में क्या उन्हें ट्रायल में जाना होगा। क्या उन्हें जेल में बंद कर दिया जाएगा। क्या उन्हें जबरन किसी और देश में भेज दिया जाएगा।

महाशय मैं उम्र और तजुर्बा में आपसे बहुत छोटा हूं। लेकिन एनआरसी के बारे में आप से अधिक जानता हूँ। असमिया मैथिल या बिहारी होने के कारण पता है की एनआरसी प्रैक्टिकल नहीं है। आपकी नव लेखन को पढ़कर कुल मिलाकर इतना तो कह सकता हूं कि 2014 से पहले जो पत्रकार सत्ता के विरोध में लिखता रहा हो, जो हर एक नेता को कटघरे में खड़ा करता रहा हो, जो बिहार सरकार के उस पेंशन का बहिष्कार कर चुका हो कि जब तक सब को नहीं मिलता तब तक मैं अकेले पेंशन का लाभ नहीं ले सकता। वह पत्रकार 2014 और 2019 के बाद सत्ता के शरण में जाकर जय जयकार क्यों कर रहा है। कहीं आप भी राजसभा तो नहीं जाना चाहते हैं। महाशय यकीन मानिए राज्यसभा जाने के बाद भी पत्रकार सुरेंद्र किशोर का कद बहुत ऊंचा है।बहुत बड़ा है। बहुत ही सम्माननीय है। इतना ही कहना है कि राज्यसभा टिकट के लिए इतनी चमचागिरी करना ठीक नहीं। 

पत्र पढ़ कर कष्ट पहुंची हो तो माफ़ कीजियेगा

आपका
रोशन कुमार मैथिल

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