‘मैं जेएनयू के छात्रों के पक्ष में इसलिये खड़ा हूँ कि वह उच्च शिक्षा का एक बेहतरीन संस्थान है’

‘मैं जेएनयू के छात्रों के पक्ष में इसलिये खड़ा हूँ कि वह उच्च शिक्षा का एक बेहतरीन संस्थान है’

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छपाक देखना है या नहीं, यह कोई मुद्दा नहीं है

छपाक मेरे लिये महज एक कमर्शियल फ़िल्म है। मन हुआ तो देख आऊंगा। मन नहीं हुआ तो नहीं देखूंगा। वैसे भी पत्रकारिता करते हुए ए/सिड वि/क्टिम लड़कियों की इतनी कहानियों से गुजर चुका हूँ, कि मेरे लिये यह कोई जानने लायक मसला नहीं है। हां, जिन लोगों ने इन लड़कियों का द/र्द नहीं देखा है, वे जरूर देखें। चाहें तो इस विषय पर लिखी किताबें पढ़ लें। दीपिका जेएनयू गयीं, उनके स्टैंड का स्वागत है। हम सबको जेएनयू के छात्रों के पक्ष में खड़े होना चाहिये।

मैं जेएनयू के छात्रों के पक्ष में इसलिये खड़ा हूँ कि वह उच्च शिक्षा का एक बेहतरीन संस्थान है। उसे सिर्फ इसलिये नष्ट करने की सा/जिश हो रही है, क्योंकि वहां छात्रों में जमीनी सच्चाइयों को देखने की निगाह पैदा की जाती है। असहमत होने की हिम्मत पैदा की जाती है। वह गरीब और वंचित तबके के प्रतिभाशाली छात्रों की एक बड़ी उम्मीद है। उसे अपने मौजूदा स्वरूप में बचे रहना चाहिये। इसलिये जब कोई हाल की घटनाओं के बाद जेएनयू को बंद करने या स्टूडेंट पॉलिटिक्स पर रोक लगाने की बात करता है, तो मुझे उसकी बात बचकानी लगती है। जेएनयू जैसा है, जिस रूप में है, उसका उसी रूप में बचे रहना जरूरी है।

जेएनयू में छात्र फीस वृद्धि के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। मेरा समर्थन मूलतः उसी आंदोलन को है। देश में अब बहुत कम गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षण संस्थान रह गए हैं। निजीकरण की अंधी दौड़ में शामिल हमारी सरकारें इन्हें भी खत्म कर देना चाहती हैं। अगर ये भी खत्म हो गए तो हमारे बच्चे, हमारी अगली पीढ़ी हौसला ही नहीं कर पायेगी गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा पाने की। उनके पास छोटे मोटे डिप्लोमा कोर्स करके काम चलाऊ नौकरी पा लेने का ही विकल्प रह जायेगा। असली संकट यही है।

इसलिये मैं हर हाल में जेएनयू और ऐसे दूसरे संस्थानों की बढ़ी फीस की वापसी चाहता हूँ। यह सिर्फ उन छात्रों का मुद्दा नहीं। हमारा मुद्दा भी है। इसलिये मैं चाहता हूँ कि अभी लगातार उसी मुद्दे पर बात हो। दीपिका और छपाक पर नहीं। दीपिका आईं उनका समर्थन है, मगर इस वजह से हम अपना असली मुद्दा भूल कर उनके पीछे घूमने लग जाएं यह हमारी अगंभीरता होगी। दीपिका को थैंक्यू बोलिये और फिर से फीस वृद्धि के सवाल पर फोकस कीजिये।

फिर से CAA और NRC के सवाल पर फोकस कीजिये। 22 जनवरी को कोर्ट इसपर फैसला सुनाने जा रही है। सरकार ने मुद्दे को डाइवर्ट करने के लिये 22 को ही निर्भया के गु/नहगारों की फां/सी तय की है। उन्हें करने दीजिये, बस आप मत भटिकये। फोकस बनाये रखिये। हमलोग छपाक बाद में देख लेंगे। साल दो साल बाद टीवी पर आएगी ही। अभी आपने सरकार से जो मांगा है उस पर फोकस कीजिये।

पुष्य मित्र, वरिष्ठ पत्रकार

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