एक सच्चे गांधीवादी-ईमानदार और बेदाग पत्रकार को विधान पार्षद बनाने के लिए कांग्रेस को बधाई

कांग्रेस को बहुत – बहुत बधाई। बहुत दिनों बाद कांग्रेस ने एक अच्छा निर्णय लिया है। परिस्थितिवश ही सही, पर कांग्रेस को बधाई सही निर्णय के लिए। बधाई के कई कारण हैं। एक पत्रकार को बनाया गया विधान पार्षद।
एक सच्चे कांग्रेसी को। सच्चे गांधीवादी को। ईमानदार को। बेदाग को। तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी हैं समीर भाई। साथ ही तीसरी पीढ़ी के गांधीवादी भी। महान पिता राजेंद्र बाबू के सुयोग्य संतान। महान स्वतंत्रता सेनानी बनारसी बाबू के पौत्र। बनारसी बाबू 1922 से ही अधिकतर कांग्रेस आंदोलनों में जेल गए। 1952,57,62 में मुंगेर से सांसद बने। 1962 में उनका निधन हुआ। उसके बाद उप चुनाव हुए। उसमें मधु लिमये जीते। नवशक्ति और राष्ट्रवाणी के संपादक थे बनारसी बाबू।

बनारसी बाबू आजीवन धोती और गंजी पहनते थे। गंजी कैसी तो खादी की गोल गला जेब वाली। वे धोती गंजी में ही लोकसभा जाते थे। एक बार संसद में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनसे पूछा कि वे गंजी पहन कर संसद क्यों आते हैं, कुर्ता क्यों नहीं पहनते। बनारसी बाबू ने कहा था कि वे जिस क्षेत्र से आते हैं, वहां हजारों लोग हमारी जैसी गंजी भी नहीं पहनते, तो फिर मैं कुर्ता कैसे पहनूं। ऐसे महान थे बनारसी बाबू।

मेरा बड़ा सौभाग्य रहा राजेंद्र बाबू से मिलने का। हमारे पिता और राजेंद्र बाबू दोनों परम मित्र और गुरुभाई थे। दोनों बड़े और महान सशस्त्र क्रांतिकारी से समाजवादी – गांधीवादी पंडित रामनंदन मिश्र जी के परम शिष्य। बाद में उन्होंने राजनीति छोड़ अध्यात्म पथ अपनाया(जेपी के साथ हजारीबाग जेल से दिवाली की रात भागनेवाले आज़ादी के दीवानों में ये भी थे)। साधना के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचे। लोग उन्हें बाबू जी के नाम से जानते थे। मित्र मंडली थी। तब की बिहार की सारी बड़ी हस्तियां लहेरियासराय के बंगाली टोला में जुटतीं। पिताजी के साथ झोला ढोने इस मित्र मंडली के सत्संग में जबरन जाता। 2 केंद्र थे। पहला बंगाली टोला- लहेरियासराय, दूसरा दादाबाड़ी केदारघाट-बनारस। पिटाने के डर से। पिताजी के कड़े अनुशासन के कारण। और एक लालच भी कि घूमने को मिलेगा। मित्र मंडली की टीम तीर्थयात्रा पर भी जाती- महर्षि रमण आश्रम, महर्षि अरविंद आश्रम, नंगा बाबा आश्रम……. तब न गांधीवाद समझ में आता था, न ही इन विद्वानों की बात। विनोबा जी, विमला ठक्कार, एसएन सुब्बा राव….जैसे मनीषियों से दरस-परस नासमझ उम्र में ही हो गई थी (अब मैं इसे अपना परम सौभाग्य मानता हूं, तब बचपना थी)।

एक स्मृति। बिहार में भूकंप आया था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी दरभंगा आए थे। भूकंप से हुई बदहाली देखने। कई लाल बत्तियां थीं। मंत्री लहटन चौधरी भी थे। राजेंद्र बाबू तब रिलीफ मिनिस्टर भी थे। वे भी बाबूजी के पास थे। बाबू जी ने राजेंद्र बाबू से कहा – स्वयं प्रकाश को अपने साथ लेते जाइए। रास्ते में वे हमसे बातें करते आए। मूर्खता कहें या अज्ञानता उनसे बेमतलब की बातें करता रहा। आज जो हो रहा है, वे सब बातें बाबू जी ने तब कही थी कि आनेवाले समय में ऐसे-ऐसे होगा। आज वही सब चीजें हो रही हैं। बाद में जब होश संभाला तब शर्म आने लगी। पर न बाबू जी थे, न राजेंद्र बाबू। खैर हाजीपुर में मैंने कहा – मैं यहीं उतर जाता हूं, आप पटना जाएंगे। उन्होंने कहा – या तो पटना चलो, नहीं तो मैं तुम्हारे गांव गोविंदचक चलता हूं। अंततः अंधेरे में लालबत्ती से मैं अपने घर पहुंचा। तब मंत्रियों की समाज में बड़ी इज्जत थी।

अपने पिता बनारसी बाबू की तरह वे भी नवशक्ति और राष्ट्रवाणी में पत्रकारिता को आगे बढ़ाते रहे। मेरी देखी मेरी समझी राजेंद्र बाबू के लेखों का संग्रह है। गांधी संग्रहालय से ही यह पुस्तक प्रकाशित हुई। रजी अहमद साहब के विशेष अनुरोध पर। इसमें 43 लेख हैं। तब के नवभारत टाइम्स, पटना में प्रकाशित। पुस्तक के दो शब्द में रजी साहब लिखते हैं – गांधी, विनोबा, जेपी के अनन्य भक्त, सफेद खादी की धोती और कुर्ता, सर पर गांधी टोपी, पैर में खादी भंडार का अहिंसक चप्पल, संकीर्णता से परे, मानव मूल्यों में यकीन रखते, सुलझे विचारों के विद्वान, निहायत ही नेक, मृदुभाषी, और अपने को हमेशा पीछे रखनेवाले व्यक्ति इनकी विशेष पहचान है।

रजी साहब आगे लिखते हैं – राजनीति में सक्रिय रहे गांधीयुग के एक चश्मदीद गवाह द्वारा समय-समय पर व्यक्त किये गये विचार न सिर्फ उनके जजबात की तरजुमां हैं, बल्कि उस समय के सामाजिक और राजवीतिक उतार-चढ़ाव की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज भी हैं। इन लेखों से उस समय की तस्वीर सामने आती है। जब सार्वजनिक जीवन में मान्यताएं और मूल्य बची हुई थीं, त्याग और समाज सेवा महत्व रखते थे। किसी व्यक्ति के कद की ऊंचाई को नापने का पैमाना आज की तरह स्कॉर्पियों और बोलेरो गाड़ियां या बड़ी कोठियां नहीं थीं (अब तो इससे भी महंगी गाड़ियां आ गई हैं। हाथ में सोने का ब्रासलेट और गले में मोटे सोने की चेन……।) । ये बातें 15 साल पहले गांधी जयंती पर लिखी गई हैं।

जब तक राजेंद्र बाबू जीवित रहे कंकड़बाग के उस मकान पर प्लास्टर नहीं हुआ। उनके स्वर्गवास के बाद ही यह संभव हो सका। मैं जानता हूं समीर बाबू कब के कांग्रेस में बड़े पद को हसिल कर सकते थे। पर उनकी रगों में अलग खून था – बनारसी बाबू और राजेंद्र बाबू का। समीर बाबू – टीवी पत्रकारिता के जन्मदाता और मशहूर संपादक (या यूं कहें पत्रकारिता के संस्थान) एसपी सिंह के बहनोई हैं। तब चहुंओर सुरेंद्र प्रताप सिंह की तूती बोलती थी। उनके नाम का डंका बजता था देश भर में। बिना एक रुपये लिये आदर्श शादी हुई थी समीर बाबू की। राजनीति बतौर सेवा समीर बाबू को विरासत में मिली है। रग – रग में है। दिखता भी है। झलकता-दमकता है। पर दर्प नहीं। अहंकारशून्य।

महान गांधीवादी परंपरा को दादा-पिता की तरह संजोये सादा जीवन-उच्च विचार को जीते हैं समीर बाबू। उनके बड़े भाई जेपी विवि में प्रोफेसर हैं। दोनों के जीवन में सहजता सरलता। साधारण रहन-सहन। कोई दोहरा जीवन नहीं। मनसा-वाचा कर्मणा में ऐक्य। इन्हीं सब सद्गुणों के कारण वे भीड़ से भिन्न और सबके अभिन्न हैं। एसपी सिंह पत्रकारिता व जनसंचार संस्थान के निदेशक के रूप में न जाने कितने पत्रकारों के गुरु भी हैं समीर बाबू। महान शिक्षाविद उत्तम बाबू इस संस्थान के महानिदेशक हैं। दोनों के बीच पीढ़ियों से रिश्ते हैं। 

वे छात्र संघ की राजनीति से पॉलिटिक्स में आए। पटना विवि। अनिल कुमार शर्मा ने पटना विवि में SOUL बनाया। स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन फॉर यूनिटी एंड लिबर्टी। मात्र 7 लोग इसके सदस्य थे। इसमें समीर बाबू भी थे। उनके सेनापति। साधारण घर के उच्च संस्कारोंवाले चंद्रिका बाबू के शिक्षक पुत्र अनिल कुमार शर्मा ने दिग्गजों को पटखनी दी थी। धन, जाति, धर्म, लिंग, उम्र से परे एक अलग चुनाव था - जिसे फ्रांस की क्रांति की तरह सोल के 7 लोगों ने अमलीजामा पहनाया था। पटना विवि के क्रांतिकारी अध्यक्ष बने अनिल कुमार शर्मा। बाद में अनिल कुमार शर्मा बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। ऐसा पहली बार हुआ होगा कि बिना एमपी, एमएलए या किसी धनकुबेर के सहयोग या जाति या अमीर या राजनैतिक घराना-विरासत के बगैर खपरैल घर (गांव बिधिपुर) का लाल अपने बल पर ऐतिहासिक पद पर पहुंचा। फिर समीर बाबू बिहार कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बने (इसके पहले भी वे कांग्रेस में विभिन्न पदों पर थे)। अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा का सारा लिखना - पढ़ना उनके ही जिम्मे था। जिस समीर बाबू की टिकट काटी गई थी, वही चुनाव में अनिल शर्मा के नेतृत्व में टिकट बांट रहे थे।  तब कांग्रेस की बिहार टीम ने एक नई लकीर खींची। बहुत दिनों के बाद कांग्रेस में उत्साह की लहर दौड़ी थी। वो चुनाव भी लड़े। हारे, पर हिम्मत नहीं। पार्टी पॉलिटिक्स-तिकड़म में उनका टिकट भी कटा। पर साहस और विश्वास के साथ बरास्ता विरासत चलते रहे कांग्रेस की राह। सिद्धान्त और पार्टी नहीं छोड़े। लाभ-लोभ में न दल बदले। न उनक दिल बदला।  विश्वास है कि दादाजी-पिताजी से आगे की बड़ी लकीर खींचेंगे मृदुभाषी- मितभाषी समीर बाबू। चेहरे पर हमेशा मुस्कान। साफगोई। राजेन्द्र बाबू के करीबी और उनके साथ काम करनेवाले 85 से 90 तक जीरादेई के विधायक रहे कैप्टेन डॉ त्रिभुवन सिंह कहते हैं, महान नेता-पिता के आदर्श पुत्र हैं समीर जी। बकौल डॉ साहब, कांग्रेस को निश्चित नई ऊर्जा मिलेगी। फिर से बधाई।
- swayam prakash (फ़ेसबुक से साभार)

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