कोरोना से सब जगह हाहाकार है लेकिन बिहार में बहार है… नीतीशे कुमार है

यदि आपको अब भी लगता है कि बिहार में कोरोना जांच के लिए कोई लैब या सेंटर है तो आप ख़ुद को गफलत में रखे हुए हैं.

यहां जांच की पूरी प्रक्रिया यह है: “राज्य भर के संदिग्ध मरीजों के सैंपल आरएमआरआई को भेजे जाते हैं. आरएमआरआई में इन सैंपल्स का केवल कलेक्शन होता है. शुरुआती स्क्रीनिंग (भेजे जाने लायक हैं या नहीं!) के बाद कोलकाता भेजा जाता है. कोलकाता वाले लैब में जांच होती है. वहां से रिपोर्ट आती है पहले बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग को . और फिर विभाग अस्पतालों को रिपोर्ट भेजता है. और इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम 24 घंटे का वक़्त लगता है. यही कारण है कि बिहार में रिपोर्ट तब मिलती है जब मरीज़ की मौत हो जाती है.”:

और आपको यह भी मालूम होना चाहिए कि मौत के कारण को बदलना किसी भी सरकार और प्रशासन के लिए चुटकी बजाने भर की बात है. मैंने यह बात पहले दिन से कही है कि बिहार में कोई जांच नहीं होती क्योंकि यहां वैसा लैब (VRDL) नहीं सेट है. अभी प्रस्तावित है.आरएमआरआई के निदेशक अखबारों में झूठा बयान दे रहे हैं या अखबार फर्जी तरीके से छाप रहे हैं. उनके मुताबिक छह मार्च से ही वहां जांच चल रही है. और तब 100 टेस्ट किट उनके पास उपलब्ध थे.

बिहार ‌सरकार का स्वास्थ्य विभाग गलत विज्ञापन दे रहा है कि हमारे यहां जांच होती है. अगर जांच हो ही रही है तो 100 किट अब तक ख़त्म हो चुके होंगे. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव कई बार पूछ चुके हैं, “सरकार बताए कि उसके पास जांच के लिए कितने किट हैं, कितने इक्विपमेंट हैं.” यह ऐसा समय है जब सूचना का एकमात्र स्रोत ‌सरकार बन गई है. उसमें भी सरकार की टॉप की मशीनरी. वह अपनी सुविधानुसार और मनमाफ़िक जानकारियां मीडिया को दे रही है.

बिहार के लोग तो वैसे भी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मरते आ रहे हैं सालों से. मगर अब मौतें बढ़ेंगी. बस आपको यह नहीं बताया जाएगा कि मौत कोरोना से हुई या नहीं.
हफ़्ते, दो हफ़्ते बाद जब अस्पतालों से मरीजों की मौत का आंकड़ा निकलेगा और उसकी तुलना सामान्य दिनों में होने वाली मौतों से की जाएगी तब शायद सच्चाई का पता चल सके.

बहरहाल, बाहर रहने वाले बिहारियों की भारी भीड़ बिहार के गांव-गांव में पहुंच गई है. गांवों की पारिस्थितिकी बिगड़ने का ख़तरा भी हो गया है. सभी मजदूर और कामगार लोगों के काम बंद हैं. लॉकडाउन के कारण राशन, फल, सब्जियों के दाम बेतहाशा बढ़ गए हैं. मुझे ‌सबसे अधिक फ़िक्र उन दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों, रेहड़ी लगाने वालों, रिक्शा-ठेला चलाने वाले, भिखारियों और उन गरीबों की है जो रोज पैसा कमाते थे और तभी रोज खा पाते थे. वे क्या खा रहे होंगे, कैसे रह रहे होंगे!

Neeraj Priyadarshy, BBC

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