मोदी को सीनियर पत्रकार की सलाह- अर्थव्‍यवस्‍था में चमत्‍कार चाहते हैं तो अपना लें मनमोहन की नीतियां

देश की अर्थव्यवस्था इस समय बुरे दौर से गुजर रही है। कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन ने इस स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। सरकार की तरफ से अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कई कोशिशें की जा रही हैं लेकिन अभी तक अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि आज देश की अर्थव्यवस्था का जो हाल है साल 1991 में इससे भी बुरे हालात थे लेकिन तब मनमोहन सिंह और पीवी नरसिम्हा राव की जोड़ी ने बड़े आर्थिक सुधार कर ना सिर्फ अर्थव्यवस्था को संकट से उबारा बल्कि उसे मजबूत गति प्रदान की, जिससे हम दुनिया की सबसे तेज गति से तरक्की करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो सके।

द क्विंट में राघव बहल ने इसी मुद्दे पर लिखे एक लेख में कहा है कि 1991 से सबक लेकर सरकार आज भी अर्थव्यवस्था में जान फूंक सकती है।

पहला सबक- दोहरा ऋण स्थगनः डॉ. मनमोहन सिंह ने एक जुलाई 1991 को सरकार के आदेश से रुपए का नौ फीसदी अवमूल्यन कर दिया था। सरकार के इस फैसले से पहले से घबराए बाजार में भगदड़ मच गई। इसके दो दिन बाद यानि कि तीन जुलाई को सरकार ने फिर से रुपए का 11 फीसदी अवमूल्यन कर दिया। इसका असर ये हुआ कि इससे बाजार में शांति आयी और बिकवाली पर रोक लगी। इसके दो साल बाद स्थिति थोड़ी बेहतर होने पर सरकार ने करेंसी को ‘नियंत्रित विदेशी मुद्रा विनिमय दर’ के हवाले कर दिया, जो कि अच्छा फैसला साबित हुआ।

लेख में लिखा गया है कि ऋणों में बदलाव का फैसला मनमोहन सिंह और पीवी नरसिम्हा राव के जुड़वा ऋण स्थगन के फैसले में मौजूद है। इसके तहत वास्तविक तौर पर संकटग्रस्त कर्जदारों के लिए, कम से कम एक बार पुनर्गठन की अनुमति देनी चाहिए। वहीं आदतन कर्ज ना चुकाने वालों को इसमें कोई राहत नहीं दी जानी चाहिए। साथ ही निजी कर्जदारों के लिए इक्विटी टॉप-अप प्लान लाया जाना चाहिए।

दूसरा सबक- लाइसेंस से मुक्ति और सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश का मॉडलः राव और सिंह की जोड़ी ने नई औद्योगिक नीति पेश करते हुए 18 नियंत्रित उद्योगों को छोड़कर सभी की लाइसेंस की जरूरत को खत्म कर दिया था। इससे देश में उद्योगपतियों को बिजनेस करने की स्वतंत्रता मिली थी। एकाधिकार समाप्त कर दिया गया और सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के शेयरों को बेचने की अनुमति दे दी गई थी।

तीसरा सबक- अमेरिकी डॉलर जुटाकरः 1991 में आर्थिक सुधार करते वक्त मनमोहन सिंह और पीवी नरसिम्हा राव की जोड़ी ने अमेरिकी डॉलर जुटाने और देश में इक्विटी परंपरा को शुरू करने के प्रयास किए। साथ ही भारत के शेयर बाजार को विदेशी निवेशकों के लिए खोल दिया। इसी तरह अब मोदी सरकार के पास कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार तैयार करने का बेहतरीन विकल्प मौजूद है।

लेख के अनुसार, भारत सरकारी डॉलर बॉन्ड से शिकागो, लंदन और सिंगापुर बॉन्ड मार्के से 10 बिलियन डॉलर जुटाता है। वो भी ऐसे समय में जब डॉलर कमजोर हो रहा है। इस दिशा में भारत को मल्टी बिलियन डॉलर का कॉरपोरेट बॉन्ड एक्सचेंज वजूद में लाने का मौका मिल सकता है। इससे बचतकर्ताओं के लिए नई कर्ज परंपरा भी शुरू हो सकती है।

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