CAB : क्या असम के लोग देशद्रोही हैं, क्या असमिया लोगों के दिल में भारत के लिए प्रेम नहीं रहा

कैब अर्थात नागरिकता संशोधन बिल, जो कि लोक सभा और राज्य सभा से पास होने के बाद भारत का एक कानून बन चुका है। कैब अर्थात सटिजिन अमेंडमेंट बिल, जिसके कारण असम सहित पूवोत्तर राज्यों में इन दिनों ब’वाल मचा हुआ है।

अब सवाल उठता है कि क्या असम के लोग देशद्रोही हैं। क्या असमिया लोगों के दिल में भारत के लिए वह प्रेम नहीं रहा जो कभी हुआ करता था। क्या लाचित वरफुकन के वंशज देशभक्ति भूलकर गद्दार हो गए हैं।

असम में हो रहे विवाद को समझने से पहले आपको वह चश्मा अपनी आंखों से उतारना होगा जिससे आप बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली सहित अन्य राज्यों को देखते हैं। असम के लोग हिंदू होकर भी हिंदू नहीं है। भारतीय होकर भी भारतीय नहीं है। मुस्लिम होकर भी मुस्लिम नहीं हैं। पंजाबी होकर भी पंजाबी नहीं हैं। तो फिर वह हैं क्या। वह सिर्फ और सिर्फ असमयिा हैं। असमिया उनकी सभ्यता है और असमिया उनकी संस्कृति है। वह उन तमाम लोगों को अपना मानते हैं जो उनकी असमिया भाषा का सम्मान करता है। वह उन तमाम लोगों को टारगेट करते हैं जो असमिया भाषा को अपना नहीं मानते हैं।

कैब पास होने के बाद बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से मुस्लिम के अलावे कई धर्म के लोग आएंगे। इसमें से हिंदू बंगालयिों की संख्या सबसे अधिक होगी और है। संभवतः यही कारण है कि असम के लोग इस बिल के खलाफ बोल रहे हैं। उन्हें डर है कि असम में बंगाली समाज के लोग बहुसंख्यक हो जाएंगे और बंगाली भाषा उनकी मातृभाषा को उसी तरह निगल जाएगा जिस तरह त्रिपुरा में निगल गया हैैं। उनका मानना है कि असमिया समाज एक ना एक दिन अपने हि घर में अल्पसंख्यक बनकर रह जाएगा।

असम के लोग असम को उसी तरह से मां मानते हैं जिस तरह से भारत के लोग भारत को मां मानते हैं। तभी तो उनका मूल स्लोगन है जय आइ असम। अर्थात असम माता की जय। वहां के लोगों के मन में गांधी, नेहरू, भगत सिंह सहित उन तमाम लोगों के प्रति मन में सम्मान है, लेकिन इन सबसे इतर वह उन 855 लोगों का सम्मान तन मन धन से करते हैं जिन्होंने भाषाई अंदोलन में अपने जान गवां दिए। इस आंदोलन के बाद ही उन्हें असम एकार्ड अर्थात असम समझौता मिला। इसके तहत तय किया गया था कि 1971 के बाद जो भी विदेशी लोग असम आए हैं उसे बाहर जाना होगा।

असम अकार्ड आज तक लागू नहीं हो पाया है। प्रफुल कुमार महंत से लेकर हितेश्वर सैकिया तक और तरूण गोगोई से लेकर सर्वानंद सोनोवाल तक सबने वोट बैंक की चाह में असमिया समाज को ठगने का काम किया। कांग्रेस ने मुसलमानों की राजनीति की तो भाजपा हिंदूओ का ठेकेदार बन गया। किसी ने यह सोचा ही नहीं कि असमिया समाज के लोग क्या चाहते हैं।

एनआरसी का काम सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में किसी तरह स्र्टाट हुआ। बांगलादेशियों को चुनचुनकर बाहर भेजने का पीएम नरेंद्र मोदी ने चुनावी सभा में नारा दिया। वहां के लोगों ने लोक सभा और बाद में विधान सभा में भाजपा को जमकर वोट किया। एनआरसी पर तेजी से काम हुआ। रिपोर्ट जारी किया गया। लिस्ट में मुस्लिम से अधिक हिंदुओं का नाम आया खासकर बंगालियों का। खेल यही से खराब हो गया। भाजपा ने हिंदुओ को बाहर ना किया जाए इसलिए कैब ले आई और बवाल शुरू हो गया।

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