मोदी सत्ता की असफलता पर टिकी है सोनिया की सफलता

काग्रेस का इतिहास रहा है, वह अपने बूते सत्ता में लौटती नहीं है बल्कि विपक्ष में रहते हुये सत्ता की असफलता ही उस सत्ता दिलाती है । यानी काग्रेस ने त कभी खुद को बदला है ना ही किसी काग्रेसी अध्यक्ष ने काग्रेस को बदलने की कवायद की है । और ध्यान दें तो 139 बरस पुरानी काग्रेस में 1920 के बाद कुछ बदला नहीं है । कह सकते है कि ये काग्रेस की कमजोरी रही कि महात्मा गांधी के संघर्ष के तौर तरीको को काग्रेस के शासको ने सत्ता में आने के बाद आत्मसात किया नहीं और एक वक्त गांधी जी को भी लगा कि आजादी के बाद भी गुलाम बनाने की मानसिकता सत्ता में जारी है । और तब उन्होने सिवाय गोरी चमडी से भूरी चमडी में सत्ता परिवर्तन के और कुछ देखा नहीं। और काग्रेस को खत्म करने की सोची भी । और शायद आजादी के बाद राष्ट्रीय राजनीतिक दल के तौर पर काग्रेस ने खुद को हमेशा उस राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में ही देखा जिस परिपेक्ष्य में आजादी का आंदोलन चल रहा था ।

आदिवासी हो या दलित या फिर पिछडे गरीब हो या चकाचौंध के मिजाज से सराबोर शहरी जीवन । काग्रेस ने नीतिगत तौर पर जगह विकास के उस ढांचे को ही दी जिससे लाभ पूंजीपतियो को होता । उघोगपतियो को होता या कहे पैसे वालो को मुनाफा मिलाता । यानी जो आवाज नीचले स्तर पर जानी चाहिये थी और समाज के नीचले स्तर से आवाज मुख्यधारा को प्रभावित करनी चाहिये थी वैसे हालात कभी काग्रेस ने पैदा होने ही नहीं दिये या कभी प्रयास भी नहीं किया । असर इसी का हुआ कि जो तबके काग्रेस को साथ बरसो बरस से जुडे रहे वह धीरे धीरे बदलती आर्थिक- समाजिक परिस्थितियो में काग्रेस स छिटकने लगे । कह सकते है मंडल की राजनीति ने सबसे पडी सेंध काग्रेस में पिछडी जातियो को लेकर लगायी और क्षत्रपो की कतार काग्रेस के सामानातातंर कागरेस की ही जमीन पर खडी हो गई । फिर बाबरी मस्जिद का ढहना और अयोध्या में राम मंदिर को लेकर आंदोलन ने काग्रेस के उस चरित्र के सामने संकट खडा कर दिया जो आजादी के आंदोलन के बाद खुद को सभी का मान कर सेक्यूलर और समाजावादी खोल ओढे हुये था । जब काग्रेस के सामने वैचारिक और चुनावी जीत का संकट शुरु हुआ तो और धीर धीरे बतौर एक दूसरे राष्ट्रीय राजनीतिक दल के तौर पर बीजपी ने इसी जमीन को पकडा ।

वाजपेयी के दौर और मोदी के दौर का सबसे बडा अंतर यही है कि वाजपेयी काग्रेस की कमजोर नस को समझ रहे थे और राष्ट्रीय परिपेक्षय में बीजेपी को गठबंधन के आसरे खडा कर रहे थे । लेकिन मोदी के वक्त में उम्मीद और सपनो की जो कतार उग्र तरीके से पिछडे और हाशिये पर पडे तबको में उभारी गई उसने झटके में काग्रेस ही नहीं बल्कि क्षत्रपो को राजनीतिक मैदाने से बाहर कर दिया क्योकि बीजेपी मंडल आंदोलन से निकले क्षत्रपो से कही ज्यादा उग्र जातिय राजनीति की नब्ज को थाम सत्ता दिखाने लगी । तो मु्सिलम तुष्टिकरण की काग्रेस नीति से कही ज्यादा उग्र होकर मुस्लिमो को राजनीति बिसात से ही बाहर कर हिन्दुत्व का चोगा राष्ट्रवादी होकर परोसने लगी । ऐसे में सामान्य तौर पर कोई भी राजनीतिक पंडित यही कहेगा कि सोनिया गांधी के सामने अब 2014 और 2019 की हार के बाद सबसे बडी चुनौती 2024 की है । और काग्रेसी खुद में विश्वास पैदा कर सकते है कि सोनिया गांधी का अपना इतिहास अध्यक्ष के तौर पर बेहद सफल भी रहा है ।

सोनिया के बीस बरस [ 1998-2018 ] अध्यक्ष रहने के दौरान दस बरस काग्रेस ने सत्ता में गुजारे है । और काग्रेस सत्ता में तभ आई जब वाजपेयी का शाइनिंग इंडिया फेल हो गया । यानी काग्रेस के लिये पहली मोटी लकीर यही है कि अब सोनिया गांधी की बतौर अध्यक्ष सफलता मोदी सत्ता की असफलता पर निर्भर है ।
तो क्या वाकई मोदी असफल होगें । और सोनिया सफल हो जायेगी । या फिर पहली बार बतौर काग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी काग्रेस को ही बदलने का प्रयास करें । जाहिर है दोनो हालातो को परखे तो काग्रेस और बीजपी में एक तरह की तुलना हमेशा के लिये अब बन चुकी है । यानी इससे पहले काग्रेस के विस्तार के सामने जनसंघ , जनता पार्टी और फिर बीजेपी की तुलना होती नही थी । लेकिन अब ऐसा संभव नहीं है । क्योकि पहली बार बीजेपी की अगुवाई करते नरेन्द्र मोदी ने निशाने पर उसी नेहरु गांधी डायनेस्टी को लिया जिस डायनेस्टी को लोकतांत्रिक तरीके से काग्रेस ने आत्मसात कर लिया । यानी काग्रेस में अध्यक्ष के चुनाव को लेकर बीते 70 दिनो को परखे तो दो बात उभरती है । पहला नेहरु गांधी परिवार ने खुद को काग्रेस से अलग कर जब काग्रेस संगठन को ही अपने नेता का चुनाव करने का फैसले करने का मौका दिया तो भी काग्रेस डायनेस्टी के अलावा कुछ देख नही पायी ।

दूसरा राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड कर ये लकीर उन काग्रेसियो के लिये खिंच दी जो 10 जनपथ के चक्कर लगाकर खुद को बनाये टिकाये रखते थे । कह सकते है ये काग्रेस का ट्रासभरमेशन का दौर है । तो इसी दौर में दो सवाल एक साथ है । पहला , काग्रेस मेंडायनेस्टी है लेकिन लोकतंत्र है । दूसरा बीजेपी में लोकतंत्र है लेकिन सत्ता आथेथियरेन यानी एक व्यक्ति के निर्णय पर जा टिक है । जाहिर है इसे जनता भी देखे रही है और राजनीति करने वाले काग्रेसी बीजेपी के नेता भी परख रहे है । लेकिन काग्रेस के सत्ता में आने के तरीके जब सत्ता के फेल होने पर ही ज्यादा टिके है तो फिर मोदी सत्ता को भी यहा परखना होगा और मोदी सत्ता के आसरे काग्रेस के भीतर सोनिया के होने के अंदेशे को भी जानना है । दरअसर मोदी सत्ता 2014 में आर्थिक आधारो का जिक्र कर रही थी । इसीलिये तब ‘ अच्छे दिन आने वाले है ‘ का जिक्र था । लेकिन 2018 के बाद मोदी सत्ता ने पटरी बदली और अच्छे दिन का राग गायब हो गया उसके बदले राज्य गव्रनेंस के बदले हुये तौर तरीके साफ तौर पर उभरने लगे । जिसमें हिन्दुत्व है । राष्ट्रवाद है । कश्मीर है । और ये सब इसलिये है कियोकि नोटबंदी के जरीये कालाधन कम हुआ नहीं । जीएसटी के जरीये व्यापारियो की मुश्किले कम हुई नहीं । और पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तीनी आईएसआई को भी पठानकोट घुमाना और खुद नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देने के लिये लाहौर चले जाने ने हालात और बदतर कर दिये । लेकिन नया सवाल तो ये है कि जब आर्थिक नीतियो के फेल होने के बाद पहला दर्द जब पूंजिपतियो या कहे कारपोरेट-उघोगपतियो में ही दिखायी देने लगा है तो अगर दर्द उस गरीब-पिछडो में पनपेगा ।

जिसे 20222 तक घर मिलने वाला है । जिसके अंकाउंट में दो से पांच हजार पहुंच रहे है । क्योकि बिगडी अर्थवयवस्था कब तक बांटने पर चलती रहगी । और फिर मध्यम तबके में भी निराशा पनपेगी जो 2014 में मोदी सत्ता से उम्मीद बांधे था । यानी चाहे अनचाहे देश के भीतर के अंतर्विरोधो को मोदी सत्ता किन किन माध्यमों से कितने दिन तक साध सकती है । सोनिया की सफलता इस खेल की असफलता पर भी टिकी है । और उसके सामानातंर पहली बार काग्रेस को मथते हुये उन मुद्दो को समझ र देश के लिये काग्रेसी विजन को भी पुख्ता करने की सोच पर टिकी है जहा दलित-आदिवासी-मुसलमान – किसान खुद का काग्रेसी राज में हाशिये पर ना माने और काग्रेसी अब ये सोच कर राजनीति ना करें कि बीजेपी से दूरी बनाने वाले काग्रेसी वोटर है । या काग्रेसी ये सोच कर राजनीति ना करें कि वोटर तो अब उन्ही पर टिका है । सोनिया की ये परिक्षा भी है और मौका भी ।

लेखक : पुण्य प्रसून वाजपेयी

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