MP प्रिंस राज के दिल में बसते हैं भैया चिराग पासवान, चच्चा पारस की धमकी के बाद लिया अलग होने का फैसला

बोले पारस, “तुम्हारे बिना भी कोरम पूरा हो रहा”, फिर बागियों में शामिल हुए प्रिंस : बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के टूटने की कहानी सियासी होने के साथ कुछ-कुछ फिल्मी भी है। चाचा पशुपति कुमार पारस बनाम भतीजे चिराग पासवान की लड़ाई देखते ही देखते सोमवार (14 जून, 2021) को सड़क पर आ गई थी। लेकिन इसकी स्क्रिप्ट काफी पहले लिखी जा चुकी थी, जिसके लिए पारस ने अपने दूसरे भतीजे और लोजपा सांसद प्रिंस राज को अपने खेमे में कर लिया था। दो टूक कहा था कि उनके (प्रिंस) बगैर भी कोरम (सदस्‍यों की वह न्‍यूनतम संख्‍या जिसके होने पर ही बैठक में निर्णय लिए जा सकें) पूरा हो रहा है, जिसके बाद वह बागियों में शरीक हो गए थे।

दरअसल, पारस के साथ प्रिंस के आने के पीछे की एक वजह यह भी मानी जा रही है कि वे दोनों एक ही घर में रहते हैं। दोनों की अधिक बनती भी है। हालांकि, चाचा ने उन्हें कह दिया था कि उनके बिना चार लोगों (चौधरी महबूब अली कैसर, वीणा देवी, चंदन सिंह और चंदन सिंह) का कोरम पूरा हो है। सोच-विचार के बाद प्रिंस उनके साथ आ गए। शनिवार को इससे जुड़े फैसले/रणनीति को आखिर स्वरूप तब दिया गया, जब पारस राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली पहुंचे थे, जबकि फूट के खुलासे के बाद सोमवार सुबह पारस ने प्रेस वार्ता कर कहा कि उन्होंने पार्टी तोड़ी नहीं बल्कि बचाई है। उन्होंने इस दौरान जेडीयू में जाने की अटकल को गलत बताया। साथ ही कहा, “लोजपा का NDA से अलग होने का फैसला गलत था। मैं एनडीए में था, हूं और रहूंगा।” चिराग से रिश्तों को लेकर उन्होंने कहा कि उन्हें कोई दिक्कत या आपत्ति नहीं है।

पारस, लोजपा संस्थापक दिवंगत राम विलास पासवान के छोटे भाई हैं। उन्हें लोकसभा में पासवान के बेटे चिराग की जगह स्थान पर पार्टी के नेता के रूप में मान्यता दी गई। लोजपा के छह में से पांच सांसदों ने रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर उन्हें एक पत्र सौंपा था जिसमें चिराग के स्थान पर पारस को पार्टी का नेता नियुक्त करने का अनुरोध किया गया था। लोकसभा सचिवालय ने सोमवार को एक संशोधित अधिसूचना जारी की जिसमें पारस को लोजपा के नेता के रूप में मान्यता दी गई है। सूत्रों के अनुसार, असंतुष्ट लोजपा सांसद चिराग के काम करने के तरीके से नाखुश हैं। इन नेताओं का मानना है कि नीतीश कुमार के खिलाफ लड़ने से प्रदेश की सियासत में पार्टी को नुकसान हुआ।

वैसे, विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने के लिये बिहार में सत्ताधारी राजग से अलग होने वाले पासवान ने हालांकि नरेंद्र मोदी और भाजपा समर्थक रुख कायम रखा था। केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की सुगबुगाहट के बीच सियासी समीकरणों पर नजर रखने वालों का मानना है कि यह कदम पासवान को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने से रोकने का प्रयास है। हालांकि, यह देखना अभी बाकी है कि भगवा दल लोजपा में इस फूट को कैसे देखता है।

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