बगावत पर बोले चिराग, मेरे पास खोने के लिए क्या है, 40 वर्ष राजनीति करूँगा, चचा का मंत्री बनने का अंतिम मौका है

लोजपा में टूट के साथ ही यह चर्चा जोड़ पकड़ने लगा है कि चिराग का भविष्य क्या होगा क्यों कि छह में पांच सांसद पारस के साथ खड़े हैं और ऐसा दिख रहा है कि चिराग की वापसी बहुत मुश्किल है क्यों कि बिहार के कार्यकर्ता और नेताओं से चिराग का वो रिश्ता नहीं है जो रिश्ता रामविलास पासवान का हुआ करता था हलाकि ऊपरी तौर पर ऐसा जरुर दिख रहा है इसकी वजह है बिहार में पार्टी सगंठन पारस के साथ है क्यों कि संगठन पूरी तौर पर पारस के हाथ में ही रहा करता था और रामविलास पासवान इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करते थे ।

चिराग के पार्टी प्रमुख बनने के बावजूद भी जमुई को छोड़ कर दूसरे जिलों में चिराग भी उस तरह से हस्तक्षेप नहीं करता था ।वही पारस के काम करने की शैली और बातचीत इतना मधुर रहा है कि कार्यकर्ता और पार्टी के नेताओ से इनका बहुत ही गहरा रिश्ता रहा है लेकिन ये सारे रिश्ते पर्दे के पीछे का रहा है ऐसे में पार्टी भले ही पारस के साथ खड़े हो जाये लेकिन लोजपा का कोड़ वोटर पासवान पूरी तौर पर चिराग के साथ दिख रहा है, खास करके पासवान के यूथ में चिराग का जबरदस्त क्रेज हैं दरभंगा ,समस्तीपुर ,खगड़िया ,हाजीपुर ,गया और जमुई के लोगों से जो हमारी जो 24 घंटे के अंदर बात हुई है उससे तो ऐसा ही लग रहा है ।

लेकिन ये सब चिराग के कार्यशैली पर निर्भर करता है कि वो अपने आपको बिहार के लोगों से कैसे जोड़ता है ये देखना होगा वैसे वोटर चिराक के साथ है ।

चिराग जिद्दी और अड़ियल स्वभाव का लड़का है –बिहार में कुछ ऐसे पत्रकार है जिनसे इसकी बातचीत होती रहती है कल की घटना के बाद चिराग की पहली प्रतिक्रिया यही था कि मेरे पास खोने के लिए क्या है अभी तो मैं 40 वर्ष राजनीति कर सकता हूं । चाचा जी का यह अंतिम पाली है और स्वभाविक तौर पर मंत्री बनाने का आँफर है वो क्यों नहीं जायेंगे हमारे साथ रहते तो वो मंत्री नहीं बन पाते राजनीति में यह सब चलता रहता है । मैं जल्द बिहार आ रहा हूं और दिल्ली छोड़कर बिहार में रहेंगे नीतीश जी ने मेरे पापा को हमेशा व्यक्तिगत रुप से अपमानित करते रहे हैं उनके विरोध का कारण भी यही था, हां देखना यह है कि मोदी और शाह अंकल क्या करते हैं क्यों कि मैं उनके प्रति वफादार हूं ये जो सारे छोड़ कर गये हैं वो नीतीश के प्रति वफादार हैं ऐसे में अब मोदी और शाह सर को सोचना है कि उन्हें मेरी जरुरत है या नहीं है क्यों कि 2014 के लोकसभा चुनाव में सबको पता है पापा बीजेपी के साथ जाने को तैयार नहीं थे और मेरी जिद्द की वजह से वो बीजेपी के साथ चुनाव लड़े थे अच्छा हुआ यह सब पहले ही गया । देखे तो सही मेरी वफादारी का मुझे क्या इनाम मिलता है वैसे बिहार फस्ट बिहारी का फस्ट का अभियान जैसे ही राज्य कोरोना से बाहर आयेगा शुरु कर देगे ।

बिहार की राजनीति में हमेशा बीजेपी मुंह के बल गिरी है —बिहार में जनसंघ जमाने से लेकर आजतक बिहार बीजेपी कभी भी स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पायी है हमेशा एक कदम आगे बढ़ती है तो दो कदम पीछे खीच लेती है और इस वजह से सुशील मोदी को छोड़कर बिहार बीजेपी में कोई दूसरा पिछड़ा नेता पैदा ही नहीं हो सका और आज बिहार में सबसे मजबूत स्थिति के बावजूद बीजेपी कुछ कर नहीं पा रही है और पार्टी के विधायक से लेकर कार्यकर्ता तक इस बार भी इतनी बड़ी विजय के बावजूद सत्ता में भागीदारी महसूस नहीं कर पा रही है।

संकट यही है और इस बार बीजेपी इसी चरित्र को बदलने के लिए समय समय पर अपनी ही सरकार के खिलाफ हमलावर होती रहती है लेकिन नीतीश के राजनैतिक शैली को कैसे नियंत्रित रखे इसको लेकर कोई रणनीति नहीं है।
लोजपा के विधायक जदयू में जाने से पहले बीजेपी के तमाम बड़े नेता से मिले लेकिन बीजेपी निर्णय नहीं ले सकी कि इसको पार्टी में मिलाये या ना मिलाये आखिरकार वो जदयू का दामन थाम लिया ।

अभी भी बिहार बीजेपी राजनैतिक निर्णय लेने से डरती है कि कही नीतीश नराज तो नहीं हो जायेंगे ।जिसमें क्षमता है नीतीश से आंख में आंख मिला कर बात करने का वो सरकार और पार्टी दोनों जगह ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वो नीतीश के भक्त हो ,जी है हम बात सुशील मोदी कि कर रहे हैं आज भी बिहार बीजेपी में यही एक चेहरा है जो नीतीश को भी उसी अंदाज में जबाव दे सकते हैं जिस अंदाज में लालू को देते रहते हैं ।
लेकिन इनकी राजनैतिक शैली का मिजाज ऐसा नहीं है और बीजेपी के सामने यही समस्या है देखिए आगे आगे होता है क्या लेकिन इतना तो तय है कि नीतीश कुमार के इस मुहिम में बीजेपी चुप रह गयी तो फिर आने वाले समय में बिहार में बीजेपी में कभी नहीं वाली टैग लग जाये तो कोई बड़ी बात नहीं होगी, क्यों कि चिराग के साथ आज जो कुछ भी हुआ है वो मोदी और शाह के करीब होना भी एक बड़ी वजह है ।

संतोष सिंह, कशिश न्यूज़

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