हमेशा के लिए भारत में बंद हुआ BBC हिंदी रेडियो का प्रसारण

साल 2019 को बीतने में अभी तीन दिन बाकी है।बीबीसी हिंदी को उसके अस्सी साल पूरे होने लगभग साढ़े चार महीने पहले रेडियो प्रसारण के प्रातःकालीन प्रसारण आज हमेशा के लिए बंद हो गया। बीबीसी हिंदी रेडियो के सांध्य कालीन प्रसारण भी 31 जनवरी 2020 को हमेशा के लिए बंद हो जायेगा।

इससे पहले भी एक बार बीबीसी हिंदी का प्रसारण बंद हो रहा था। तब हमने भारी मात्रा में लंदन चिठ्ठी लिखा। उस समय बीबीसी के पत्रकारिता प्रमुख निक्की क्लार्क को कई पत्र लिखें गए। पहले उस पत्र को हमनें हिंदी में लिखा और बाद में अंग्रेज़ी में अनुवाद कर लंदन तक पहुँचाया। ब्रिटेन के राजनीतिक दल लेबर पार्टी के सांसदों का भी साथ मिला।

दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैय्यर और इंदर मल्होत्रा ने भी बीबीसी मुख्यालय को चिठ्ठी लिखी। सैम मिलर, मार्क टुली, सतीश जैकब जैसे विख्यात पत्रकारों ने भारत में बीबीसी हिंदी के रेडियो प्रसारण के महत्व को लंदन में बताया। प्रसारण बंद नहीं हुआ। तब, सांध्यकालीन प्रसारण जारी रखने की बात लंदन ने मानी। उसके बाद पुनः सवेरे का प्रसारण भी आरंभ हुआ। फिर हाल ही में प्रसारण बंद होने की सूचना बीबीसी हिंदी रेडियो पर आयी।

बहरहाल, इसके साथ ही आने वाली नस्लें दो तरह की होंगी। पहली, जिन्होंने बीबीसी हिंदी का प्रसारण रेडियो पर सुना है और दूसरा, जिसने नहीं सुना है। रेडियो प्रसारण बंद होने के पहले भी दो तरह के श्रोता हुए। एक, जिसने बीबीसी हिंदी का स्वर्णिम काल देखा और सुना। दूसरा, जिसने बीबीसी के हिंदी के बदतर काल में प्रसारण को बंद होते देखा। 11 मई 1940 को बीबीसी हिंदुस्तानी सेवा आरंभ हुआ।

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद बीबीसी हिंदुस्तानी का भी बंटवारा हुआ। हिंदुस्तानी प्रसारण अब हिंदी और उर्दू में आने लगा। यह सब दस्तवेज़ों में दर्ज़ है। बीबीसी की हालत संजीव श्रीवास्तव के जमाने से बदलने लगी। संजीव श्रीवास्तव के भारत संपादक बनते ही बीबीसी हिंदी भारत प्राइवेट लिमिटेड हो गयी। बीबीसी समाचारों का संपादन का ग्लोबल व्यू के बदले उसका उत्तर भारतीयकरण होने लगा। अचला शर्मा रिटायर हुए। ममता गुप्ता और मरहूम सलमा ज़ैदी के बाद सीमा चिश्ती और रेणु आगाल भी बीबीसी से सबन्ध तोड़ लिए।

अमित बरुआ के संपादन में बीबीसी की हालत थोड़ी ठीक हुई। निधीश त्यागी के आने से बीबीसी बद से बदतर हो गयी। बीबीसी दैनिक जागरण बनने को उतावला हो गया। राज्य के ब्यूरो को दिल्ली बुलाया जाने लगा। जो नहीं गए वे रिटायर होने लगे। श्रीनगर से अल्ताफ़ हुसैन, गुवाहाटी से सुबीर भौमिक, पटना से मणिकांत ठाकुर, जयपुर से नारायण बारेठ, लखनऊ से रामदत्त त्रिपाठी, हैदराबाद से ओमर फारूख दिल्ली आने से मना कर दिया और बीबीसी छोड़ दिया। स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली। हालांकि, अचला शर्मा के दौर में भी बीबीसी हिंदी में एक-दो ऐसे लोग प्रवेश किये जो बीबीसी के गाइड-लाईन के खिलाफ थे।

बहरहाल, निधीश त्यागी ने बीबीसी को कूड़ेदान में तब्दील कर दिया। उनके ज़माने में ऐसे लोगों की बीबीसी में नियुक्ति हुई जिनकी योग्यता वैसी नहीं थी। बाद में तो ऐसी नियुक्तियों की ऐसा आंधी तूफान आया कि बीबीसी से मोह जाता रहा। जो टीवी चैनलों और अखबारों से ऐसे आये, जिन्हें बिना बीबीसी के रिपोर्टिंग दिशा-निर्देश और मानक पता नहीं उन्हें रिपोर्टिंग के लिए भेज दिया गया। बाकी लोग बीबीसी में सिर्फ नौकरी बजाने लगे। कुछ तो ऐसे हाई-प्रोफ़ाइल रिपोर्टर नियुक्त हुए जिनके अलर-बलर रिपोर्टों पर वाह-वाही होने लगी।ग़लत नैरेटिव गड़ा जाने लगा। इन्हीं दिनों सेक्स संबंधी खबरों को खूब तरज़ीह दिया जाने लगा। सोसल मीडिया के धुरंधरों के बतकुच्चन को ख़बर बनाया जाने लगा। दूसरे चैनलों से सीधे बीबीसी में नियुक्त हुए रिपोर्टर चुटीलेबाजी करने लगे। ख़बरों को देने बदले खुद को ख़बरों में लाना पसंद करने लगे।

-आशुतोष कुमार पांडेय, आरा

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.