बीएचयू के प्रोफेसर साहेब का नया कारनामा, बच्चों को सिखाया कि गाय के गोबर से गोइठा कैसे बनाएं

NEW DELHI-बीएचयू में प्रोफेसर ने सिखाया उपले बनाना : वाराणसी। बीएचयू के समन्वित ग्रामीण विकास केंद्र में शुक्रवार को संकाय प्रमुख प्रो. कौशल किशोर मिश्रा ने विद्यार्थियों को उपले बनाने का प्रशिक्षण दिया। उपले बनाने में भारतीय नस्ल की गाय का गोबर प्रयोग में लाया गया। उन्होंने देसी गाय के गोबर से मिलने वाले रोजगार की जानकारी दी।

पकौड़ा रोजगार की अपार सफलता के बाद पेश है कंडा पाथो योजना। दिलचस्प तो ये है कि काम मुझे पांच छह साल की उम्र से आता है, उसे कोई प्रोफेसर सिखाएगा? मतलब क्या? उसमें क्या सिखाएगा? और वे कौन लोग हैं जो कंडा पाथना सीखेंगे?कंडा या उपला हमारी पहली स्मृतियों में दर्ज है। हमने होश संभाला तो कंडे की छवि हमारे दिमाग में पहले से मौजूद थी। दादी कंडा पाथती थीं तो हम बच्चे वहीं पर, कभी कभी उनके गोबर के ढेर से खे​ला करते थे। कभी कभार हम भी हाथ आजमा लेते थे। गोल वाली पोपरी तो आराम से बना लेते थे जो दीवार में चिपका दी जाती है।

भारत की आम जनता जो काम बिना किसी प्रशिक्षण के सदियों से कर रही है, उसके नाम पर बीएचयू जैसे बड़े विश्वविद्यालय में करोड़ों रुपये क्यों फूंके जा रहे हैं? भारत में गोबर गैस इसलिए लोकप्रिय नहीं हो पाया क्योंकि गोबर गैस की तकनीक काफी महंगी है। हमारी दादी के बाद कंडा पाथना बंद कर दिया गया ​क्योंकि कंडा जलता नहीं, सिर्फ सुलगता है। घर की दीवारें काली पड़ जाती हैं और बरसात में छतों से टार टपकता है। कंडे से ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले किसी ईंधन के बारे में मुझे नहीं मालूम है।

आज पूरी दुनिया प्रदूषण मुक्त ईंधन पर काम कर रही है, तब भारत के टॉप विश्वविद्यालय गाय पालना और कंडा पाथना सिखा रहे हैं जो हम मध्ययुग में भी करते थे। क्या हम सबसे प्रदूषक ईंधनों में शुमार कंडे को वापस लाना चाहते हैं? यह कोर्स शुरू करने का मकसद क्या है? जो सरकार उज्ज्वला योजना का फटा ढोल पीट रही है, वह युवाओं को कंडा पाथना सिखा रही है? यह जिस गधे का आइडिया है, वह विशुद्ध पागल है। उसका तत्काल प्रभाव से सरकार इलाज कराए। वह युवा भारत के लिए खतरा है।

वे कौन गदहे प्रोफेसर और छात्र हैं जो सिखा रहे हैं और सीख रहे हैं? मैं जानता हूं कि मैं अपमानजनक और कड़े शब्दों का इस्तेमाल कर रहा हूं, लेकिन मैं सायास ऐसा कर रहा हूं। किसी दिन कोई और बड़ा गदहा कहेगा कि आओ गोबर और माटी लीपना सिखाएं। जानवर खड़ा दाना खाते हैं तो वह पचता नहीं, गोबर के साथ खड़ा खड़ी ही बाहर आ जाता है। किसी दिन कोई चूतिया कहेगा कि आओ गोबर से दाना बीनकर रोटी बनाना सिखाएं! ये हमारे टॉप के संस्थानों में हो क्या रहा है? कौन इन्हें बर्बाद करने का अभियान चला रहा है?

विश्वविद्यालय में कंडा पाथने का कोर्स चलाना जिस महापुरुष का आइडिया है, वह भारतीय युवाओं को अक्ल का अंधा बनाकर तीन चार सदी पीछे ले जाने की देशद्रोही परियोजना पर काम कर रहा है। ऐसे लोगों से, ऐसे विचारों से, ऐसे संस्थानों से सतर्क रहें।

-Krishnakant, Senior Journalist

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