बिहार के गरीब सांसद भोला बाबू की कहानी, ना रहने के लिए पक्का घर था और ना चुनाव लड़ने के लिए पैसा

सरकारी नहीं.. कच्चे मकान में रहते थे ये सांसद, चंदे के पैसे से लड़ा था चुनाव, दलित और पिछड़ों की लड़ी लड़ाई : बिहार के जमुई लोकसभा सीट से साल 1971 में भोला मांझी सांसद निर्वाचित किए गए थे. उनका चुनाव प्रचार आज भी लोगों को याद रहता है.

साल 1950 में भोला मांझी एक स्कूल में शिक्षक के तौर पर बच्चों को पढ़ाने का काम करते थे. उसी दौरान एक दिन जब वो कुर्सी पर बैठकर बच्चों को पढ़ा रहे थे तभी उस गांव के एक संभ्रात परिवार का व्यक्ति आया और उनसे बात करने लगा. इस दौरान उस व्यक्ति ने महादलित होने के बावजूद भी भोला मांझी को कुर्सी पर बैठे रहने के लिए खरी-खोटी दी.

इस घटना ने उनके जीवन पर इतना असर डाला कि उन्होंने शिक्षक की नौकरी छोड़ दी और दलित, वंचित और पिछड़ों के उत्थान के लिए सक्रिय राजनीति का दामन थाम लिया. इसके बाद उन्होंने सीपीआई के टिकट पर सर्वप्रथम 1957 में विधानसभा का चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उन्हें 17,378 वोट मिले और उन्होंने अपने सबसे निकटतम प्रतिद्वंदी को 3,345 वोट से हरा कर विधानसभा का सफर तय किया.

सांसद भोला मांझी के करीबी रहे कैलाश सिंह बताते हैं साठ के दशक के अंतिम दिनों में और 70 के शुरुआती दशक में भोला मांझी के जुझारूपन से प्रभावित होकर जिला प्रशासन ने उन्हें जमीन देने का फैसला किया और तत्कालीन डीसीएलआर ने उन्हें बुलाकर 5 एकड़ जमीन का दिया था. लेकिन उन्होंने यह कह कर फाड़ कर फेंक दिया था कि जब तक सभी भूमिहीन और बेघर लोगों को जमीन नहीं मिल जाती तब तक किसी सरकारी जमीन का लाभ नहीं लेंगे.

इसके बाद भोला मांझी जितने दिन सांसद रहे, अपने खपरैल के मकान में ही रहे. साथ ही घर आने वाले लोगों को बैठने के लिए एक ही खाट की व्यवस्था थी. जिस पर बैठकर लोग देर तक चर्चा किया करते थे. इतना ही नहीं भोला मांझी ने अपने चुनाव का प्रचार भी चंदे से पैसा इकट्ठा कर किया था और वह चुनाव जीते भी थे.

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