चकबंदी क़ानून पर संकट, हाई कोर्ट ने कहा- चकबंदी के सर्वे कानून को क्यों न असंवैधानिक कर दें

सरकार ने कोर्ट से कहा-एक जिले की चकबंदी में 2 साल लग जाएंगे, तो फिर 38 जिलों में तो 76 साल लग जाएंगे

राज्य सरकार ने हाईकोर्ट से कहा कि ‘अधिकतम संसाधन मिलने के बाद सूबे के एक जिले में हवाई सर्वे और उसके बाद चकबंदी करने में करीब दो साल लग जाएंगे।’ इस पर हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की, कहा-’यदि एक जिले में कृषि भूमि की चकबंदी करने में दो साल लगेंगे, तो फिर 38 जिलों में तो 76 साल लग जाएंगे! यही हाल रहा तो सरकार का विशेष सर्वे कानून, चकबंदी कानून को खारिज सा कर देगा, उसे धत्ता बता देगा।’

चीफ जस्टिस संजय करोल व जस्टिस डॉ. अनिल कुमार उपाध्याय की खंडपीठ शुक्रवार को कैमूर किसान समिति की जनहित याचिका की सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान सरकार के हलफनामे में दर्ज चकबंदी में लगने वाले समय की चर्चा आई। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि 2011 के बिहार सर्वे कानून को क्यों नहीं असंवैधानिक घोषित कर दिया जाए? राज्य सरकार को एक हफ्ते में इसका जवाब देना है।

विशेष सर्वे कानून तो चकबंदी प्रक्रिया को फेल कर देगा
कोर्ट ने बिहार विधानमंडल से 2011 में पारित सर्वे कानून की संवैधानिकता पर सवाल उठाया। कोर्ट के अनुसार, ऐसा इसलिए कि यह कानून, चकबंदी की व्यवस्था का विरोधाभासी है। कोर्ट ने कहा-’इस मामले में महाधिवक्ता ललित किशोर कानूनी बिंदु पर सरकार का पक्ष रखें।’ सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील अमिश कुमार ने सरकार के जवाबी हलफनामा के हवाले कोर्ट को चकबंदी में लगने वाले समय की जानकारी दी। ध्यान रहे कि 2011 के विशेष सर्वे कानून के तहत राज्य की जमीनों का पहले प्लॉट दर प्लॉट हवाई सर्वे होना है। फिर, सर्वे रिपोर्ट के आधार पर खंडित कृषि जोतों (जमीनों) का एकीकरण यानी चकबंदी होगी। कोर्ट ने अपनी मौखिक टिप्पणी में विशेष सर्वे कानून के इस प्रावधान को चकबंदी प्रक्रिया को फेल करने वाला बताया। इस मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी।

नियोजित शिक्षकों को देना ही होगा ईपीएफ का लाभ
कोर्ट ने सरकार को फिर आदेश दिया कि कांट्रैक्ट पर नियुक्त पंचायत शिक्षकों (नियोजित शिक्षकों) को ईपीएफ का लाभ दें। न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार की एकल पीठ ने लखन निषाद एवं अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शुक्रवार को यह आदेश दिया। कहा कि शिक्षा सचिव ने पहले ही निर्णय लिया था कि इन शिक्षकों को ईपीएफ का लाभ दिया जाएगा। लेकिन सरकार अपना यह निर्णय अब तक कार्यान्वित नहीं कर पाई है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील कुमार नलिन ने कोर्ट को बताया कि एक लोकहित याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कांट्रैक्ट पर नियुक्त शिक्षकों को ईपीएफ का लाभ देना चाहिए। ईपीएफओ के अधिवक्ता प्रशांत सिन्हा ने केन्द्रीय भविष्य निधि के अपर आयुक्त के 17 जनवरी के पत्र का जिक्र करते हुए कहा कि इस बारे में माध्यमिक शिक्षा निदेशक के स्तर से भी निर्णय लिया जा चुका है कि नियोजित शिक्षक भी इस लाभ के हकदार हैं।

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