शारदा सिन्हा के बिना अधूरा है बिहार का लोक पर्व छठ पूजा, रातों रात बनी सुपर स्टार

कहा जाता है कि जब शारदा सिन्हा के छठ गीत बजने लगे तो समझिए छठ आ गया है, यानी छठ गीत और शारदा सिन्हा एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। ऐसे में शारदा सिन्हा छठ को लेकर क्या सोचती हैं, वे गीतों के जरिए छठ का अर्घ्य कैसे देती हैं, छठ से जुड़ी उनकी यादें कौन-कौन-सी हैं, यह जानना दिलचस्प होगा। आप भी पढ़िए छठ को लेकर वे क्या कह रही हैं…।

छठ का नाम सुनते ही भावनाओं में बहने लगती हूं। बैठे-बैठे गाने लगती हूं- केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव झांकी-झुकी…, सोना सटकुनिया हो दीनानाथ…। विश्वास कीजिए, ये छठ गीत कभी पुराने नहीं होंगे। समय के साथ सब कुछ बदला है, लेकिन प्रकृति का यह पर्व उसी रूप में चलता आ रहा है। न इसके गीत बदले, न इसके प्रसाद। अब जब प्रसाद की बात हो रही है, तो मुझे अपना बचपन याद आ रहा है। छठ के प्रसाद के लिए कैसे होड़ लगती थी। ठेकुआ या अंकुरित चना पाकर हम सब बच्चे कितने खुश होते थे, बता नहीं सकती। छठ पर्व पर हम सब बच्चों को नये-नये कपड़े मिलते थे।

मुझे याद है, मैं छठी कक्षा में थी। मुझे जिद थी कि पॉकेट वाला फ्रॉक चाहिए और आखिर में मुझे मिला भी। पीला-नीला का कॉम्बिनेशन वाला फ्रॉक, जिसे पहनकर मैं खूब इठला रही थी। कुछ भी नहीं भूली हूं। सब कुछ याद है। मेरी नानी छठ करती थी। उस साल नानी ने कहा कि अबकी बार पटना के घाट पर छठ करूंगी। फिर क्या था, घर में तैयारियां शुरू हो गई। आज का जमाना नहीं था कि हर सामान फटाफट मिल जाए। उस समय छठ के लिए बहुत तैयारियां करनी पड़ती थीं। मेरी ममेरी बहन, उन दिनों पीएमसीएच की स्टूडेंट थी। उन्होंने कहा कि सब लोग पटना आइए और फिर पूरा परिवार उठ कर पटना आ गया। किराए पर रूम लिया गया और छठ की तैयारियां शुरू हो गईं। सोचिए छठ करने के लिए एक महीने पहले किराये का रूम लिया गया था खजांची रोड में। पहली बार पटना की छठ देखने का मौका मिला।

पटना का छठ देश-दुनिया में शुरू से प्रसिद्ध है। अब तो छठ दुनियाभर में चली गयी है। शायद ही कोई देश हो जहां पूर्वांचल के लोग न हों और वे छठ न करते हों। छठ महापर्व का विस्तार लगातार हो रहा है। उस दौर में भी पटना के घाटों पर भीड़ रहती थी, लेकिन आज वाली स्थिति न थी। आज तो इतनी भीड़ रहती है कि पैर रखना मुश्किल हो जाता है।

आस्था के इस महापर्व में हर साल अपने गीतों के जरिए भगवान भास्कर को अर्घ्य देती हूं। मुझे याद है 1978 में पहली बार मेरे छठ गीत रिकॉर्ड हुए थे। उन दिनों छठ के गीत ना के बराबर बजते थे। कंपनी वाले रुचि ही नहीं लेते थे। एकाध गीत विन्ध्यवासिनी देवी जी का रेडियो से सुनने को मिल जाता था। हमलोगों को बहुत आग्रह करना पड़ा। हमलोगों ने कहा कि आप लोग रिकॉर्ड कीजिए, अगर नुकसान होगा, तो हम लोग जगह-जमीन बेच कर पैसा दे देंगे। इस तरह काफी मनुहार के बाद पहली बार 1978 में एचएमवी पर मेरा छठ गीत आया- डोमिन बेटी सूप ले ले ढाड़ छे…अंगना में पोखरी खनाइब, छठी मइया अइतन आज…जैसे गीतों को लोगों ने इतना पसंद किया कि कंपनी वाले खुद कहने लगे कि और रिकॉर्ड करना है।

अब जमाना बदल गया है। टेक्नोलॉजी इतनी आगे चली गई है कि हर मिनट नई चीजें सामने आ रही हैं। रिकॉड्र्स, कैसेट, सीडी के दौर से दुनिया आगे निकल चुकी है। अब तो यू-ट्यूब पर छठ गीतों की भरमार है। इसमें भी मजेदार बात है कि कहानी के साथ छठ गीत पेश किए जा रहे हैं। पिछले वर्ष मेरे बेटे अंशुमान ने एक अलग ही शुरुआत कर दी। शायद यह पहला मौका था जब विदेश में रहनेवाले बिहारियों और घर आने की उनकी छटपटाहट कहानी के साथ-साथ छठ गीत में आयी। पहिले-पहिले छठ मइया…गीत को लोगों ने खूब पसंद किया। इस गीत को हृदय नारायण झा ने लिखा और आदित्य देव ने संगीत दिया। मैं आज भी छठ गीतों के लिए मां की दी हुई उस किताब को जरूर देखती हूं, जिसमें ढेर सारे गीत हैं। मैं खुद भी कभी-कभी लिख लेती हूं। या फिर छोटे-छोटे गीतों को कुछ लाइन जोड़कर बना लेती हूं। मेरी मां कहती थी कि अगर चार लाइन का भी छठ गीत है, तो उसमें परिवार का नाम और मन्नतों को जोड़-जोड़ कर बड़ा बना सकती हो और यह काम आज भी मैं करती हूं।

आज मुझे वो दिन भी याद आ रहे हैं,जब मैं बहुरिया थी। ससुराल (सिंहमा-बेगूसराय) में मेरी सासू मां छठ करती थी। घर की बहुओं को घाट तक ले जाने के लिए ससुर जी बैलगाड़ी मंगवाते थे। हम सभी बहुएं बैलगाड़ी पर चढ़कर घाट जाती थीं लेकिन बैलगाड़ी घाट से पहले ही रोक दी जाती थी। जब पूछती थी कितना दूर है घाट, तो घरवाले कहते थे कि बस आ ही गए हैं, थोड़ी दूर है, दस मिनट में पहुंच जाएंगे…लेकिन उन लोगों का दस मिनट खत्म होने का नाम ही नहीं लेता था। बहुत दूर पैदल चलना पड़ता था। हमलोग घूंघट डाले और गीत गाते हुए घाट पर पहुंचते थे और घाट पर पहुंचते ही छठ गीतों की मिठास से मन भर आता था। उस मिठास को आज भी महसूस कर रही हूं, क्योंकि छठ के गीत आज भी वैसे ही हैं। गीतों की मिठास हमें अपने गांव आने के लिए विवश करती हैं।

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