नहीं रहे डाक्टर उत्पलकांत सिंह, बच्चों काे छूकर जान जाते थे बीमारी, टोटके के रूप में काट लेते थे चिकोटी

वरीय शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. उत्पलकांत सिंह का गुरुवार को दिल्ली के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। वे 73 साल के थे। वहां उनके पेट के कैंसर का इलाज चल रहा था। वे मूल रूप से बिहटा के अमहारा गांव के निवासी थे। शिशु रोग में कई प्रकार के रिसर्च कर परचम लहराने वाले डॉ. उत्पलकांत बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उनके दो बेटे और एक बेटी हैं। एक बेटे विधायक हैं तो दूसरे विदेश में बड़े पद पर कार्यरत हैं। बेटी अमेरिका में चिकित्सक (पल्मोनोलॉजिस्ट) हैं।

यादें… पढ़ते समय नींद न आ जाए इसलिए मच्छरदानी नहीं लगाते थे
ग्रामीण डॉ. उदय राज ने बताया कि डॉक्टर साहेब गांव के ग्रामीण हों या क्षेत्र के लोग, सभी से बहुत ही आत्मीय ढंग से मिलते थे। युवाओं को पुराने लोगों की कहानी सुनाकर उन्हें प्रेरित करना, सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी लेने की आदत उन्हें गांव के लोगों में खास ओहदे पर पहुंचा देती थी। कठिन परिश्रम की बदौलत उन्होंने नाम रोशन किया। अभी के छात्र इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि उस जमाने में अच्छे परिवार से ताल्लुक के बावजूद वे रात में इसलिए मच्छरदानी लगाकर नहीं पढ़ते थे कि उन्हें नींद आ जाएगी।

डाॅक्टर साहेब की अलग खासियत थी। उनके निधन से चिकित्सा जगत को बड़ी क्षति हुई है। वे बच्चे काे छूकर उनकी बीमारी जान जाते थे। जांच में भी कमाेबेश वही बातें अाती थीं। किसी भी बच्चे की जांच के अंत में उनका टोटके के रूप में चुट्टी काटना मशहूर था। इलाज के इन तरीकाें के कारण वे बिहार के अलावा झारखंड में भी मशहूर थे। डॉक्टर साहेब की स्कूलिंग पटना काॅलेजिएट स्कूल में हुई। पीएमसीएच से 1972 में एमबीबीएस किया। एमडी की पढ़ाई पूरी की। फिर आगे पढ़ने इंग्लैंड चले गए। वहां से एमआरसीपी करने के बाद बिहार लौटे और बच्चों के इलाज में जुट गए। पीएमसीएच और एनएमसीएच में भी सेवाएं दीं। एनएमसीएच में शिशु रोग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से रिटायर्ड हुए।

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