गरीबों के मसीहा हैं लालू, पत्थर तोड़ने वाली भगवतीया देवी को चुनावी टिकट देकर बनाया सांसद

लालू प्रसाद को आज भी जन नेता कहा जाता है। उनके देशी स्टाइल पर तो आज भी लोग दीवाने हैं। कहा जाता है कि बिहार कि राजनीति में लालू एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने सर्वहारा को बराबरी पर लाने का अवसर दिया। गोपालगंज टू रायसीना नामक किताब में एक ऐसी ही घटना का उल्लेख है। कहा जाता है कि लालू प्रसाद ने सड़क किनारे पत्थर तोड़ने वली भगवतीया देवी को पहली बार संसद का टिकटदिया था। वह गया से लोक सभा में जीतकर पहुंची थी।

किताब में लालू कहते हैं कि जब मैंने भगवतीया देवी वह गया जिले की पहाड़ियों में पत्थरों की खुदाई करती थीं को बुलाया और मैंने उन्हें नामांकन पत्र दाखिल करने को कहा, तो वह चौंक गई। वे मुख्यमंत्री से इसतरह के प्रस्ताव की उम्मीद नहीं कर रहे थे। मैंने संसदीय चुनावों के लिए भी इन वर्गों और समुदायों के उम्मीदवारों को चुना। भगवती देवी मुसहर समुदाय की एक बड़ी नेता थीं। उन्होंने दिहाड़ी मजदूर के रूप में अपना जीवन शुरू किया।

वह गया जिले की पहाड़ियों में पत्थरों की खुदाई करती थीं। वह 940 के दशक में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राम मनोहर लोहिया और जेपी से जुड़ गई थीं और जेल भी गई थीं। वह 1969 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर गया से विधायक चुनी गई थीं। लेकिन बाद के नेताओं ने उन्हें किनारे कर दिया। मैंने उन्हें 1996 में गया लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से टिकट दिया, और वह 14वीं लोक सभा के लिए चुनी गईं। बाद में, उनकी बेटी समता देवी हमारी पार्टी में शामिल हो गईं और गया से विधायक भी चुनी गई। ऐसे और भी तमाम लोग हैं, जिन्हें मैंने चुना और आगे बढ़ाया। लेकिन यहां सबका नाम लेना कठिन है। सूची लंबी है।

बताते चले कि बात 1968 की है। बाराचट्टी की रहनेवाली भागवती देवी जीविकोपार्जन के लिए गया शहर के पास के गांव नैली-दुबहल में पत्थर तोड़ रही थीं। इसी बीच उस रास्ते से सोशलिस्ट नेता उपेंद्र नाथ वर्मा गुजर रहे थे। भागवती पत्थर तोड़नेवाली अन्य महिलाओं के साथ तो बातें कर रही थीं, उसे सुन वर्मा जी के पांव ठिठक गये। थोड़ा ठहरे। भागवती को पास बुलाया और कहा, राजनीति में आ जाओ। तुम्हारा व समाज दोनों का भला होगा। बाद में उपेंद्र नाथ वर्मा ने भागवती के बारे में तब के सोशलिस्ट नेता राम मनोहर लोहिया को बताया।

लोहिया जी भी भागवती के जुझारूपन के कायल हो गये और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी जिसका बरगद छाप चुनाव चिह्न था, से टिकट देकर बाराचट्टी विधानसभा से मैदान में उतारा। भागवती विजयी होकर पहली बार विधानसभा पहुंचीं। 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतीं। हालांकि यह सरकार लगभग दो ही साल चल सकी। वर्ष 1980 से भागवती राजनीति से दूर चली गयीं।

सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं को भागवती के बारे में तो पता था ही। इसी बीच 1990 में लालू प्रसाद की सरकार आयी, 1995 में लालू प्रसाद ने फिर भागवती देवी को बुलाकर टिकट दिया और वह राजद के टिकट पर विधायक बनीं। एक ही साल बाद लोकसभा का चुनाव था और राजद के टिकट पर भागवती को गया संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने का मौका मिल गया। सरल, सहज व अक्खड़ स्वभाव की महिला जिनमें जुझारूपन था, ने यहां भी अपने को स्थापित किया और बन गयीं सांसद।

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