गया के शफीक उर रहमान खान को मिला वर्ष 2019 के लिए प्रतिष्ठित ‘ग्रिनेल पुरस्कार’

पटना : बिहार के गया जिले के रहनेवाले शफीक उर रहमान खान को वर्ष 2019 के लिए प्रतिष्ठित ‘ग्रिनेल पुरस्कार’ का विजेता चुना गया है. शफीक उर रहमान खान का चयन कमजोर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए दिया जा रहा है. ग्रिनेल कॉलेज इनोवेटर फॉर सोशल जस्टिस प्राइज (ग्रिनेल पुरस्कार) ऐसे लोगों को सम्मानित करता है, जो अपने क्षेत्रों में नेतृत्व करने के साथ सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन में रचनात्मकता के साथ अपनी प्रतिबद्धता और असाधारण उपलब्धि दिखाते हैं. शफीक उर रहमान खान को भारतीय दुल्हनों की तस्करी को खत्म करने में उत्कृष्ट योगदान के लिए ग्रिनेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. प्रतिष्ठित ग्रिनेल पुरस्कार पानेवाले गया के शफीक उर रहमान खान पहले भारतीय हैं. सामाजिक कल्याण के लिए उनकी विनम्रता और जुनून की वैश्विक समुदाय में प्रशंसा की जा रही है.

बिहार के गया जिले के 35 वर्षीय शफीक उर रहमान खान 15 वर्ष की उम्र में ही गरीबों की भलाई के लिए सक्रिय भूमिका निभाने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गये थे. गरीबी और बंधुआ मजदूरी में फंसे लोगों की दुर्दशा और अमीर-गरीब के बीच की खाई पाटने के लिए वह काम करने लगे. करीब चार साल काम करने के बाद वह पार्टी से अलग होकर वह अपने तरीके से काम करने लगे. वर्ष 2004 में वह दिल्ली पहुंचे और ‘बंधुआ मजदूर मुक्ति मोर्चा’ में शामिल हो गये. यह संस्था ‘कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ’ काम कर रही थी. ‘सामाजिक मूल्य’ में महिलाओं के दुश्मनों को देखते हुए उन्होंने नारीवादी आंदोलन का अध्ययन करना शुरू किया. महिलाओं के उत्पीड़न, प्रकृति और उनके मूल अधिकारों के बारे में जानकारी हासिल की. वर्ष 2006 में उन्होंने बैचलर ऑफ सोशल वर्क की डिग्री हासिल की. इसके बाद से वह लगभग 13 वर्षों से इसी काम में जुटे हैं.

उन्होंने वर्ष 2006 में कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ 300 किमी लंबे मार्च का नेतृत्व किया. इसी दौरान वह तस्करी की जा रही दुल्हन से मिले और उसकी दुर्दशा के बारे में जाना. करीब एक महीने बाद उस दुल्हन के बारे में पता किया. पता चला कि उसे बेच दिया गया है. उस महिला का कोई पता-ठिकाना नहीं मिला. महिलाओं की प्रताड़ना, गर्भ में हत्या, सौ रुपये से कम में लड़कियों को बेचना और गुलामों का जीवन जीना देख कर उन्होंने अपना ध्यान मानव तस्करी और लैंगिक असमानता के मुद्दे पर केंद्रित करना शुरू कर दिया. महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई जारी रखते हुए उन्होंने अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने फेलोशिप के लिए आवेदन भी किया. साथ ही उनके जीवन में जरूरी बदलाव लाने की कोशिश शुरू की. वह दिल्ली में एक प्रमुख नारीवादी संगठन ‘जगोरी’ के पहले पुरुष सहकर्मी बने.

शफीक ने वर्ष 2006 में ‘इंपावर पीपुल’ नाम से एक संगठन की स्थापना की. इस संगठन का उद्देश्य विवाह के नाम पर तस्करी की जानेवाली महिलाओं को विकल्प प्रदान करना था. संगठन ने जल्द ही ब्राइड ट्रैफिकिंग पर काम करना शुरू कर दिया. संगठन ने लोगों को दुल्हन की तस्करी के खतरे के बारे में जागरूकता फैलाने का काम शुरू कर दिया.

अभार : प्रभात खबर

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