ऐ मेरे वतन के लोगों… सुन रो पड़े पंडित नेहरू, आंसू पोंछकर लता से कहा-बेटी, तुमने मुझे रुला दिया

अक्टूबर 1962 में जब हम अपने घरों में बैठकर दीवाली मना रहे थे उस समय हमारी सेना के जवान हिमालय की दुर्गम बर्फ़ीली पहाड़ियों में दुश्मनों के साथ ख़ू/न की होली खेल रहे थे। चीन के साथ हमने हिंदी चीनी भाई भाई की चादर बुनी थी। रिश्तों की वह चादर तार-तार हो गई थी। चीन ने हमारे ऊपर आ/क्रमण करके हमें स्तब्ध कर दिया था। चीन की भारी-भरकम सेनाओं के सामने टिकना आसान काम नहीं था। हमारे हिंदुस्तानी जवानों ने बहुत बहादुरी से मुक़ाबला किया। हमारी सैन्य तैयारी पूरी नहीं थी। हमारी सेना के पास बर्फ़ में पहने जाने वाले समुचित कपड़े और जूते नहीं थे। परिणाम ये हुआ कि हमारे काफ़ी सैनिक इस यु/द्ध में शहीद हुए। पूरे देश में दुख और हताशा छा गई। यह तय किया गया कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर यु/द्ध में श/हीद जवानों के परिवारों के सहायतार्थ रक्षा मंत्रालय और फ़िल्म जगत की ओर से एक चैरिटी कार्यक्रम का आयोजन किया जाए।

मुंबई के फ़िल्म जगत में यह सूचना पहुंचते ही निर्देशक महबूब ख़ान की अध्यक्षता में एक संयोजन समिति बनाई गई। दिलीप कुमार, सी रामचंद्र, मदन मोहन और नौशाद ने कार्यक्रम की तैयारी शुरू कर दी। जब लोगों को मालूम हुआ कि मुंबई के कलाकारों को सेना के विशेष विमान से दिल्ली ले जाया जाएगा और फाइव स्टार होटल में ठहराया जाएगा तो कई कलाकार इस प्रयास में जुट गए कि वे भी इसी बहाने दिल्ली घूम आएं। गीतकार पं प्रदीप सीधे साधे इंसान थे। वे इस तरह के झमेले से दूर रहना पसंद करते थे। यही कारण था कि जब सी रामचंद्र ने दो-तीन बार उनसे इस मौक़े के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध किया तो वे ‘लिख दूंगा, लिख दूंगा’ कहकर उन्हें टालते रहे। लगभग सारी तैयारी हो चुकी थी। उस समय फ़िल्म के प्रदर्शन के पहले उसके गीतों की पब्लिसिटी नहीं होती थी। फ़िल्म जगत में इस बात की बड़ी चर्चा थी कि संगीतकार नौशाद ने फ़िल्म ‘लीडर’ के लिए मो रफ़ी की आवाज़ में जो गीत रिकॉर्ड किया है उसे दिल्ली में पेश किया जाएगा। फ़िल्म ‘लीडर’ उस समय तक प्रदर्शित नहीं हुई थी। शकील बदायूंनी का लिखा हुआ वह गीत था-अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, सर क/टा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं.

पं प्रदीप की उदासीनता से संगीतकार सी रामचंद्र परेशान थे। इसका पता महबूब ख़ान को लग गया। अगले दिन सुबह कुर्ता लुंगी पहने महबूब ख़ान प्रदीप के घर पहुंच गए। दोनों बहुत अच्छे मित्र थे। महबूब ख़ान ने कहा- देखो प्रदीप, तुम्हारी एक नहीं चलेगी। इस कार्यक्रम के लिए तुम्हें एक गीत तो लिखना ही पड़ेगा। जब तक तुम हां नहीं कहते मैं यहीं बैठा रहूंगा। आख़िरकार उन्होंने प्रदीप को गीत लिखने के लिए राज़ी कर लिया।

रात भर करवटें बदलने के बावजूद प्रदीप को कोई विषय नहीं सूझा। सुबह वे अख़बार पढ़ रहे थे। उसमें शेर सिंह, होशियार सिंह आदि कुछ बहादुर सैनिकों की शौर्य गाथाएं प्रकाशित हुई थीं कि किस तरह उन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ दुर्गम बर्फ़ीली पहाड़ियों में दुश्मनों से लोहा लिया और देश की ख़ातिर क़ु/र्बान हो गए। अचानक प्रदीप के मन में एक मंज़र उभरने लगा। कितनी बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर, कितनी माताओं ने अपने बेटों के मस्तक पर तिलक लगाकर और कितनी वीरांगनाओं ने अपने पतियों की आरती उतारकर उनको रणक्षेत्र में भेजा होगा। देश की ख़ातिर सीमा पर दुश्मनों से लड़ते हुए इन सपूतों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। वे लौटकर घर नहीं आए।

कवि प्रदीप को विषय मिल गया था। अभी उसे इज़हार का रास्ता नहीं मिल पाया था। शाम को वे अपने मित्र फ़िल्म श’हीद के ख/लनायक राम सिंह से मिलने के लिए शिवाजी पार्क गए थे। शिवाजी पार्क में प्रदीप के मन में गीत का जन्म हुआ। उनके होठों से कुछ शब्द छलक उठे- “जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो क़ुर्बानी।” इसी एक लाइन को गुनगुनाते हुए प्रदीप घर पहुंचे तो गीत का मुखड़ा बन गया। गाड़ी को इंजन मिल जाए तो डिब्बा जोड़ने में देर नहीं लगती। अगले दिन गीत तैयार था।

संगीतकार सी रामचंद्र आए। प्रदीप ने गीत का मुखड़ा सुनाया। उनका चेहरा उतर गया। बोले- गुरू, आपने ये क्या लिख दिया। यहां तो सर क/टाने की बात चल रही है और आप रोने धोने बैठ गए। क्या मुझे नीचा दिखाएंगे। प्रदीप ने उन्हें समझाया- अन्ना, पहले तुम शांत चित्त से पूरा गीत सुनो। जोश की अपेक्षा करुणा में ज़्यादा शक्ति होती है। अन्ना ने पूरा गीत सुना। उन्हें महसूस हुआ कि प्रदीप जी की बात में वज़न है। प्रदीप जी की ख़ासियत है कि अपने लिखे अधिकतर गीतों की धुन उन्होंने ख़ुद बनाकर संगीतकारों को दीं। संगीतकारों की सुविधा के लिए उनके पलंग के नीचे हमेशा एक हारमोनियम रखा रहता था। सी रामचंद्र ने हारमोनियम निकाला। ज़मीन पर बैठ गए। प्रदीप जी के सामने एक ट्रे में चाय का कप रखा हुआ था। उन्होंने कप नीचे रखा। तश्तरी को उल्टा करके गोद में रखा और बजाते हुए गाना शुरू कर दिया- ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आंख में, भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो क़ुर्बानी….इन लाइनों को प्रदीप ने चार पांच बार दोहराया। अन्ना ने उनकी धुन को थोड़ा सा पॉलिश किया। कुछ मित्र स्वर जोड़े और धुन तैयार हो गई। जब वही धुन हारमोनियम पर बजा कर उन्होंने प्रदीप जी को गीत के बोल सुनाए तो प्रदीप जी भी मुग्ध हो गए। बाद में अन्ना ने प्रदीप से कहा था- अगर आप इसकी धुन बना कर नहीं देते थे तो शायद मैं कुछ और तरह की धुन बनाता और उसमें इतनी कशिश नहीं होती।

प्रदीप ने अन्ना से कहा कि तुम यह वादा करके जाओ कि इस गीत के बारे में किसी को भी नहीं बताओगे। यहां तक कि अपने बीवी बच्चों को भी नहीं। फ़िल्म जगत में आइडिया चोरी होने का बहुत ख़तरा रहता है। अन्ना ने वादा कर लिया। प्रदीप ने कहा- तुम लता से इसे गाने के लिए बात करो। अन्ना पशोपेश में पड़ गए। बोले- आप तो जानते ही हैं कि आजकल लता मुझसे नाराज है। उसने मेरे साथ गाना बंद कर दिया है। वह किसी भी क़ीमत पर इसे गाने को राज़ी नहीं होगी। यही सोच कर मैंने इस गाने के लिए पहले ही आशा भोंसले को कह दिया है। प्रदीप जी ने कहा- लता की आवाज़ में जो करुणा है वह किसी भी गायिका में नहीं है। तुम आशा को समझाओ, मैं लता से बात करता हूं।

प्रदीप जी का बहुत सम्मान करती हैं लता मंगेशकर। उन्हें बाबूजी कहती हैं। प्रदीप जी को यक़ीन था कि वे लता को मना लेंगे। दूसरे दिन सुबह ताड़देव के फ़िल्म सेंटर में लता मंगेशकर की रिकॉर्डिंग थी। प्रदीप वहीं पहुंच गए। लता को स्टूडियो के एक कोने में ले गए और सीधे कह दिया- लता, तुमको अन्ना के साथ मेरा एक गीत गाना है। लता आश्चर्य से बोलीं- बाबूजी, आप ये क्या कह रहे हैं। मैंने अन्ना के साथ गाना बंद कर दिया है। प्रदीप ने समझाया- सुनो बेटी, फ़िल्म लाइन में आए दिन मनमुटाव तो होते ही रहते हैं। इसका मतलब यह थोड़े ही है कि तुम ज़िंदगी भर के लिए दुश्मनी ठान लो। और देखो, दूसरी तरफ़ मो रफ़ी भी पूरी तैयारी के साथ आ रहा है। यह इशारा काफी अहम् था। उन दिनों रफ़ी और लता में भी अनबन चल रही थी। लता ने रफ़ी के साथ भी गाना बंद कर दिया था। लता यह भी जानती थीं कि प्रदीप के गीत और अन्ना के संगीत के सामने किसी और की क्या बिसात। लता मान गईं।

अचानक एक समस्या सामने आ गई। कार्यक्रम की स्मारिका प्रकाशित होने वाली थी। महबूब ख़ान ने सी रामचंद्र से कहा- आप प्रदीप के गीत का मुखड़ा दीजिए। स्मारिका में प्रकाशित करना है। उन्होंने प्रदीप जी को सम्पर्क किया। प्रदीप जी ने कहा मैं कुछ सोचता हूं। किसी भी हाल में किसी को भी यह पता नहीं चलना चाहिए कि लता मंगेशकर कौन सा गीत गा रही हैं। काफ़ी सोचने के बाद प्रदीप ने गीत के मुखड़े से पहले चार लाइनें जोड़ीं और वही लाइनें स्मारिका में प्रकाशित हुईं-ऐ मेरे वतन के लोगो, तुम ख़ूब लगा लो नारा, यह शुभ दिन है हम सब का, लहरा लो तिरंगा प्यारा, पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने हैं प्राण गंवाए, कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर ना आए

27 जनवरी को संगीत का यह कार्यक्रम दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में आयोजित था। इस कार्यक्रम में हेमंत कुमार, जयदेव, सी रामचंद्र, अनिल विश्वास, शंकर जयकिशन, नौशाद, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और उषा खन्ना जैसे संगीतकारों के अलावा राज कपूर, दिलीप कुमार, देवानंद, राजेंद्र कुमार जैसे कई मशहूर अभिनेता और अभिनेत्रियां शामिल होने वाली थीं। इसलिए उस दिन दिल्ली शहर में ख़ासी चहल-पहल थी। नेशनल स्टेडियम कई हज़ार श्रोताओं से खचाखच भरा था। बाहर की भारी भीड़ को देखते हुए इंडिया गेट के आस पास का यातायात दोपहर से शाम तक के लिए रोक दिया गया था।

कार्यक्रम में श्रोताओं की पहली क़तार में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू, रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण, श्रीमती इंदिरा गांधी तथा कई अन्य मंत्री और सांसद विराजमान थे। ‘जन गण मन’ से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। उद्घोषक थे डेविड अब्राहम। प्रमुख सितारों ने स्टेज पर आकर संगीतकारों का परिचय दिया। तलत महमूद की दो ग़ज़लें काफ़ी पसंद की गईं। महेंद्र कपूर, सुमन कल्याणपुर और शांति माथुर भी अच्छे रहे। मो रफ़ी ने फ़िल्म लीडर का मशहूर गीत गाया- “सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं।” मगर वे श्रोताओं में कोई जोश नहीं पैदा कर सके।

बंगाली कलाकारों को भारी असफलता का सामना करना पड़ा। हेमंत दा के साथ संध्या मुखर्जी, उत्पला सेन और सतिननाथ मुखर्जी आदि ने क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम का मशहूर मार्चिंग सांग “ऊर्धे गगनने बाजे ढोल” पेश किया। यूं तो यह गीत आज़ादी के आंदोलन का एक हिस्सा था। पहले से ही लोकप्रिय था। मगर यहां वह गीत पूरी तरह फ्लॉप हो गया।

सी रामचंद्र और लता मंगेशकर इन सारी चीज़ों को ग़ौर से देख रहे थे। अन्ना को अपने संगीत और लता की आवाज़ पर नाज़ था। लता को अपने ऊपर भरोसा था। अब लता की बारी थी। उन्होंने ईश्वर का स्मरण किया और अपनी आवाज़ का जादू बिखेरना शुरू किया। पूर्व योजना के अनुसार उन्होंने सबसे पहले गाया- आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे। लता की आवाज़ का जादू श्रोताओं पर छा गया। जब उन्होंने ‘अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम’ गाना शुरू किया तो माहौल में पाकीज़गी उतर आई।
इस गीत को सुनकर श्रोता सम्मोहित हो चुके थे। यह गीत समाप्त हुआ तो पल भर के अंतराल के बाद ज़ोर शोर से गरबा की धुन बजने लगी। अभी तक पूरा वातावरण सादगी और पवित्रता में लिपटा हुआ था। गरबा का लाउड संगीत सुनकर लोग चौंक कर इधर-उधर देखने लगे। मगर सन्नाटा क़ायम था। अचानक सामने पसरे सन्नाटे को चीरती हुई करुणा में भीगी लता मंगेशकर की स्वर लहरी धीरे-धीरे माहौल पर छाने लगी- ऐ मेरे वतन के लोगो, तुम ख़ूब लगा लो नारा, यह शुभ दिन है हम सबका, लहरा लो तिरंगा प्यारा……यहां तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था। मगर जब लता ने अगली लाइनें पेश कीं- पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने हैं प्राण गवाएं, कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर ना आए….

इतना सुनना था कि दिलों में हलचल शुरू हो गई। यूं लगा जैसे किसी ने ताज़ा घाव कुरेद दिया हो। वहां पर सिर्फ़ साधारण जनता ही नहीं थी। वहां ऐसे कई परिवार थे जिन्होंने चीनी युद्ध में अपना कोई न कोई प्रिय जन खो दिया था। सूनी मांग वाली विधवाएं थीं। आहत ममता वाली माताएं थीं। जवान बेटे को खो देने वाले लाचार बाप थे। भीगी आंखों वाली बहने थीं। बाप से बिछड़े अनाथ बच्चे थे। अपने प्रिय दोस्त को अलविदा कहने वाले ढेर सारे सैनिक थे। इन सबके बीच लता की दर्द भरी आवाज़ गूंज रही थी- ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो क़ुर्बानी…

लोगों के चेहरों पर पीड़ा की रेखाएं गहराने लगीं। आंखों के कोने भीगने लगे। स्टेडियम के बाहर का शोर थम गया था। अंदर तो लगता था कि लोगों ने सांस भी लेना बंद कर दिया गया है। इस संजीदा सन्नाटे में लता मंगेशकर गाती रहीं- जब घा’यल हुआ हिमालय, ख़तरे में पड़ी आज़ादी, जब तक थी सांस ल’ड़े वो, फिर अपनी ला’श बिछा दी, हो गए, वतन पर निछावर, क्या लोग थे वो अभिमानी…

अब पं नेहरु जी ख़ुद पर क़ाबू न रख सके। आंखों से आंसू बहने लगे। उनकी रुलाई देखकर आसपास बैठे मंत्री और राजनेताओं की भी आंखों में नमी उतर आई। पं नेहरू जैसे महान व्यक्ति को रोता हुआ देखकर किसी को कोई ताज्जुब न हुआ। गीत में कुछ ऐसा जादू था जो सबको म’र्माहत किए हुआ था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बेहद प्रिय व्यक्ति हमारा दुख बांट रहा हो। हमें चीनी यु/द्ध का सामना अचानक करना पड़ा था। युद्ध के लिए हमारी कोई तैयारी नहीं थी। इस यु/द्ध में हमारे ढेर सारे निर्दोष जवान मा/रे गए थे। इसके लिए पं नेहरू ख़ुद को गिल्टी महसूस कर रहे थे। उनके अंदर की सारी पीड़ा आंसुओं के साथ बह चली। कई आंखें रो रही थीं मगर सबके कान लता की आवाज़ पर लगे हुए थे- ‘जब अंत समय आया तो’ …

इसके साथ ही माहौल में ढेर सारे समवेत स्वर गूंजने लगे- आ आ आ …। लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि स्टेज पर सिर्फ़ लता और सी रामचंद्र ही थे। इतने सारे स्वरों में जैसे आकाशवाणी हो रही थी। बात यह थी कि सी रामचंद्र ने कई लड़के लड़कियों को चुपचाप पर्दे के पीछे खड़ा कर दिया था और अब उन्हीं का कोरस गान माहौल में गूंज रहा था। इस कोरस ने जैसे सब को नींद से जगा दिया। इसी के साथ लता ने गीत की आख़िरी लाइनें पेश कीं- जब अंत समय आया तो , कह गए कि अब चलते हैं , ख़ुश रहना देश के प्यारो , अब हम तो सफ़र करते हैं , तस्वीर नयन में खींचो क्या लोग थे वो अभिमानी

गीत समाप्त हो गया मगर सन्नाटा बरकरार था। कोई कुछ ना बोला। लोग यादों में डूबते उतराते रहे। कई जगह सिसकियों की आवाज़ साफ़ साफ़ सुनाई पड़ रही थी। एक गीत ने इतिहास रच दिया था। लाखों लोगों की भावनाएं उससे जुड़ गईं थीं। नेहरू जी ने रुमाल से अपनी आंखें पोछीं। धीरे से उठकर मंच पर लता के पास गए। उनके मुंह से सिर्फ़ एक वाक्य निकला- बेटी, तुमने मुझे रुला दिया। स्वर में स्नेह की गर्मी महसूस करके लता की आंखें सजल हो गईं। कुछ देर बाद नेहरु जी ने पूछा- हू इज द राइटर, मैं उससे मिलना चाहता हूं। प्रदीप की खोज होने लगी। किसी ने बहाना बना दिया- शायद तबीयत ख़राब थी इसलिए नहीं आ पाए।

छ: महीने बाद पं नेहरू कांग्रेस के एक सम्मेलन में मुंबई आए। ग्रांट रोड के रेडीमनी स्कूल ग्राउंड में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कवि प्रदीप को मिलने के लिए बुलाया। नेहरु जी ने खड़े होकर प्रदीप का स्वागत किया। उनके हाथ थाम लिए और बोले- प्रदीप जी, वही गीत मैं आप की आवाज़ में सुनना चाहता हूं। प्रदीप जी ने पंडित नेहरू के सामने अपना गीत सुनाया। प्रदीप जी एक दिन ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। सामने वर्दी में एक सैनिक था। बातचीत में उसने प्रदीप जी को पहचान लिया। उसने प्रदीप जी के चरण स्पर्श किए। बोला- आपके गीत के अंत में आता है “जय हिंद, जय हिंद की सेना”। ऐसा सम्मान हमें कभी नहीं मिला। यह हिंद की सेना के लिए गौरव की बात है।

“ऐ मेरे वतन के लोगो” गीत को फ़िल्म जगत के कई लोग ख़रीदना चाहते थे। मुंह मांगी क़ीमत देने को तैयार थे। प्रदीप जी ने मना कर दिया। बोले- जिस गीत के चारों ओर प्रधानमंत्री के आंसुओं की झालर लगी हो उसे मैं बेच नहीं सकता। प्रदीप जी ने इस गीत की सारी रायल्टी चीनी युद्ध में शहीद सैनिकों के परिवारों को भेंट कर दी। देश विदेश में आज तक लता मंगेशकर का ऐसा कोई स्टेज प्रोग्राम नहीं हुआ जिसमें इस गीत की फ़रमाइश न की गई हो। यह एक ऐसा प्रेरक गीत है जिसने हमें अपने देश के वीर जवानों से प्रेम करना सिखाया। उनकी क़ुर्बानी को याद करना सिखाया। ऐसे अमर गीत के रचयिता पं प्रदीप को प्रणाम।

-देवमणि पांडेय

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *