क्या आप भी इस तस्वीर को अश्लील मानते हैं, अगर हां तो आपको तुरंत इलाज की जरूरत है

Geeta Yatharth : वॉशरूम का लास्ट टाइम गेट कब क्लोज किया था, याद नहीं. अब तो हालात ये है कि ऑफिस में भी, टॉयलेट का दरवाजा बंद करना याद नहीं रहता. और बेटे ने फ़ोटो क्लिक करनी सीख ली है/ सिखा दी गई है.

Awesh Tiwari : मित्र गीता ( Geeta Yatharth ) की यह तस्वीर मुझे कहीं से भी अश्लील न लगी इसमे कोई जबरिया का फेमिनिज्म भी नही है, दरअसल आपके पास वह दृष्टि ही नही है जो एक स्त्री के साथ जुड़ी समस्याओं को देख सके।गांव गिरांव में अक्सर ऐसा होता है कि खुले में शौच जाते वक्त बेटियां मां की तो माँ बेटियों की निगहबानी करती हैं।यह वह हिंदुस्तान है जहां सड़कों और कोई गाड़ी गुजरती है तो शौच के लिए गई महिला खड़ी हो जाती है फिर जब गाड़ी गुजरती है दोबारा बैठ जाती है। आज तक मैंने किसी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में नही सुना कि हम देश मे हाइवे के किनारे महिलाओं के लिए स्वच्छ शौचालयों का निर्माण करेंगे और पानी की व्यवस्था भी रखेंगे। आलम यह है कि स्त्री पुरूष सभी यात्राओं में खुले में ही शौच जाते हैं। हिप्पोक्रेसी भी अजीब है सिनेमा में आमिर खान पेशाब करे तो आप ठहाके लगाते हैं लेकिन आप एक स्त्री की सामान्य सी तस्वीर को बतंगड बना रहे इस पर तो बात भी नही होनी चाहिए थी।

CHANCHAL BHU : यह हकीकत अश्लील नही है , अधूरी है । आइये टुकड़ों टुकड़ों में आईना देखें । बूला मारीशस से आई थी ,काशी विश्वविद्यालय पढ़ने । एक दिन हम मधुबन में बैठे दोस्तों के साथ चाय पी रहे थे , अचानक एक गोल मटोल लड़की सामने आई । – चंचल डाडा ( दादा ) कौन है – मैं हूँ ,और हमने एक कुर्सी खींच कर उसके लिए लगा दिया – बताइए । – इधर लड़का लोग के लिए बाथरूम नही रहता क्या – क्यों ? – ये लोग सड़क पर यूरीन पास करता है । सब के सामने ।

कहाँ से आई हो , क्या नाम है , किस विभाग में हो वगैरह वगैरह के बाद हमने उसे राय दिया यह समझते हुए कि यह कार्यरूप में तो उतरेगा नही चुनांचे बला तो कटे । हमने संजीदगी से कहा – ऐसा है बूला कि लोंगो की तादात के अनुसार सार्वजनिक बाथ रूम नही बने हैं जो हैं सब विभाग की इमारत में हैं । दूसरी बात इन्हें कोई रोकता नही कि सड़क पर ये सब मत करो । कहीं ऐसा दिखे तो रोक दो ।

बात आई गयी हो गयी । अचानक एक दिन दीन दयाल सिंह , खैनी रगड़ते छात्रसंघ आये और आते ही बोले आज तो कांड हो गया । और कांड यह हुआ – कला भवन के सामने वाली सड़क पर रुईया मैदान की तरफ मुह करके एक लड़का खड़ा पेशाब कर रहा था , बेचारा शुरू ही किया था कि बगल से गुजरी एक लड़की वही उसके पीछे आकर खड़ी हो गयी और अंग्रेजी में पता नही क्या क्या बोली कि उसका मूतना बन्द हो गया । माफी मांग कर किसी तरह भागा । इस घटना को देखने के लिए खड़ी भीड़ की तरफ जिधर वह लड़की नजर उठाती , वे सीधे चलने लगते । इस वाकये पर एक सज्जन ने टिप्पणी की – दीन दयाल भाई !पता करिये वह कई महीने नही मूतेगा ।

बम्बई में था । एक मित्र के घर । वे दो प्राणी मियां और बीवी एक छोटा सा बच्चा था । मियां अल सुबह निकल जाते थे बीवी घर और बच्चा दोनो देखती थी । एक दिन हमने यूं ही पूछ लिया – ऋचा ! तुम्हारा नहाना , धोना , बाथरूम जाना वगैरह कैसे होता होगा ? यह बच्चा इतना छोटा ? – औरत होंगे तो सब अक्ल आ जयगी । अरे यार अकेले हूँ दरवाजा खुला रखती हूं बस ।

कलकत्ते में था । एक महिला मित्र के घर । अलीपुर में । चौरंगी जाना था । निकलते निकलते तीन बार वह बाथ रूम गयी । हमने पूछा – यह नया रोग लगा क्या ? उसने पीठ पर जोर का मुक्का मारा – बदतमीज हो क्या ? कलकत्ता है एक किलोमीटर प्रति घण्टा के हिसाब से कार चलती है तुम लोंगो का क्या कहीं भी खंभे के पीछे खड़े हो लोगे ।

शौच व्यवस्था केवल सरकार की जिम्मेवारी नही है यह सवाल समाज की जागरूकता से जुड़ा है । अपने लिए घर बना रहे हो । जानवर के लिए छत लगा रहे हो । हर घर पा अपना बाथ रूम नही हो सकता ? यह चित्र भारतीय उपमहाद्वीप की व्यथा कथा है । मुह मत सिकोड़ो इसका जवाब दो ।

Khushboo Mishra : मैं सिंगल मदर नहीं हूं लेकिन फिर भी Husband के टूर जॉब के चलते महीने में आठ-दस दिन ऐसे होते हैं जब बच्चे को मैं अकेले संभालती हूं। जब बच्ची एक महीने की थी तो सोचती कि आखिर कैसे अकेले संभालूंगी। मेड भी एक घंटे में काम खत्म कर चली जाती फिर सब ने कहा बाथरुम बंद कर के मत जाना। बच्चे पर हर मिनट नज़र बना के रखना पड़ता है। कहीं पलटने वाला बच्चा बेड से न गिर जाए, घुड़कता बच्चा कहीं कुछ फर्श से उठा के मुंह में लेकर निगल न ले। चलना सीखने के बाद तो परेशानी और बढ़ जाती है। अफसोस एक अकेली मां की व्यथा और तस्वीर को यहां ट्रोल किया जाता है लेकिन हर किसी की मां उन परेशानियों से जूझती है इसे समझने के बजाय तस्वीर पर आपत्ति जताई जाती है साथ ही मज़ाक उड़ाया जाता है। खेतों में खुले में शौच जाती स्त्री मजबूर हैं लेकिन न इन्हें शर्म नहीं आती। खुद के घर में शौचालय होने के बाद भी ये खेतों में जाते तब शर्म नहीं आती। एक जन्म देती, दूध पिलाती और बच्चा संभालती मां को देख इन्हें तस्वीर में सेंसेशनलिज्म नज़र आता है। ये तस्वीर करारा जवाब है उन सब को जो स्त्री को सिर्फ पर्दे में रहने वाली चीज़ की नज़र से देखते हैं और मातृत्व परेशानियों को मजबूरी न समझ के त्याग का प्रतीक समझते हैं। मातृत्व का महिमा मंडन करने से बेहतर है सहयोग करें और नहीं कर सकते तो कम से कम नज़रिया सही रखें

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