गुरुदास दासगुप्ता नहीं रहे, मनमोहन सिंह को समर्थन देते हुए भी दासगुप्ता ने कभी जनविरोधी नीतियों के खिलाफ चुप्पी नहीं साधी

इनका जीवन देशभक्ति का एक मस्ट रीड हिस्सा है…लौह पुरुष सरदार पटेल और लौह महिला इंदिरा गांधी को नमन.

सुबह-सुबह खबर पढी कि गुरुदास दासगुप्ता नहीं रहे. 2004 में दिल्ली आया था. पत्रकारिता की पढाई के बाद इंटर्नशिप के दौरान ही उनसे मिलने का मौक़ा मिला. शायद 2006 की बात है. यूपीए सरकार ने ताजा-ताजा बने RTI क़ानून में एक महत्वपूर्ण संशोधन का निर्णय लिया था. फ़ाइल नोटिंग हटाने का. जन्तर-मंतर पर विपक्ष समेत यूपीए को बाहर से समर्थन दे रहे लेफ्ट ने भारी विरोध किया. उसी दौरान, जन्तर-मंतर पर उनसे मिला था. उनके विचार को समझा था. आज, कल्पना कीजिए कि रामविलास पासवान, अठावले, नीतीश कुमार, अकाली या कोइ एनी एनडीए का सदस्य अपनी सरकार की गलत नीति के खिलाफ आवाज उठाए तो उसका क्या हश्र होगा.

मनमोहन सिंह को समर्थन देते हुए भी दासगुप्ता ने कभी जनविरोधी नीतियों के खिलाफ चुप्पी नहीं साधी. मुझे याद है, पेट्रोल के दाम २-३ रुपये बढ़ने पर दासगुप्ता से संसद से सडक तक कोहराम मचा देते थे. एक बार ईपीएफ का इंटरेस्ट रेट सरकार ने 1 फीसदी घटा दिया था. गुरुदास दासगुप्ता ने जन्तर-मन्तर पर न सिर्फ एक सांसद, बल्कि मजदूर नेता (एटक) की हैसियत से मनमोहन सरकार को रोलबैक के लिए मजबूर कर दिया था.

संसद के भीतर, वो वाहिद ऐसे सांसद थे, जिन्होंने अंबानी के केजी बेसिन घोटाला को ले कर आवाज उठाई. अंबानी को सुप्रीम कोर्ट जा कर इनका हस्तक्षेप रूकवाना पडा था. लेकिन, उनकी आवाज की बदौलत ही केजी बेसिन देश में एक मुद्दा बना. यहाँ तक कि तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली भी उनकी आक्रामकता से परेशान थे और कहते थे कि गुरुदास दासगुप्ता गैस प्राइस को ले कर गलत कैंपेन चला रहे है. लेकिन, दासगुप्ता ने कभी इसकी परवाह नहीं की.

२जी स्पेक्ट्रम में वे जेपीसी मेंबर थे और शायद इकलौते शख्स , जिन्होंने प्रधानमंत्री की ये कह कर खिंचाई की थी कि ये सब प्रधानमंत्री की जानकारी में हुआ है. और जब बात इंडो-यूएस न्क्यूलियर डील की आई तो समर्थन भी वापस लिया. आज समर्थन वापस ली की तो छोड़िये, लोग इस डर से ही समर्थन दे देते है कि पता नहीं कौन सी फाइल खुल जाएगी.
मौजूदा या आने वाले समय में दासगुप्ता जैसे नेता होंगे, कल्पना कर पाना मुश्किल है. शायद हो, समय का इंतज़ार कर रहे हो.

गुरुदास दासगुप्ता कम्युनिस्ट थे, सेकुलर थे, इसलिए आज की पीढी के ज्यादातर हिस्से को शायद पसंद न आए. नई पीढी शायद उनसे अनजान भी हो. इस वजह से भी वे उसे ही बेस्ट मान रहे है, जिसके सामने कोई है ही नहीं.

जानता हूँ, इतिहास शायद ही दासगुप्ता जैसे नेताओं को उचित स्थान और सम्मान देगा, ख़ास कर मौजूदा दौर में लिखे जाने वाले इतिहास के पन्नो में. लेकिन, मेरे लिए वे सही मायनों में एक देशभक्त नेता थे, जिन्हें इस देश की मजलूम जनता की चिंता थी. जो, उन मुद्दों पर बोलते थे, हस्तक्षेप करते थे, जिससे आम आदमी की जिन्दगी प्रभावित होती थी. आज तो मुर्दे भी हस्तक्षेप करने से डरते है, इस डर से कि कही मगध की शान्ति भंग न हो जाए.

एक बार फिर,
लौह पुरुष सरदार पटेल और लौह महिला इंदिरा गांधी को नमन.

कामरेड गुरुदास दासगुप्ता को सलाम….

-Shashi shekhar

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