मैंने मुस्लिम चरमपंथ को करीब से महसूस किया है और हिंदू चरमपंथ तो जिया है

PATNA : हिंदू चरमपंथी सिर्फ किसी संगठन का ही सदस्य हो ऐसा ज़रूरी नहीं बल्कि ये पत्रकार, वकील, डॉक्टर किसी भी वेश में हो सकता है। इनकी नेहरू गांधी से चिढ़ बहुत गाढ़ी है। अगर चरमपंथी अनगढ़ है तो खुलकर अपनी नफरत ज़ाहिर करेगा मगर थोड़ा भी घुन्ना है तो बेहद महीन तरीके से आपको अपनी घृणा से आश्वस्त करने का प्रयास करेगा।

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ये गांधी की अहिंसा को नकारेगा, उन्हें विभाजन का दोषी ठहराएगा, नेहरू की तुलना में सरदार-सुभाष की उपेक्षा पर बिफरकर दिखाएगा, जवाहरलाल को अय्याश ठहराएगा, कश्मीर विवाद का खलनायक बनाएगा, चीन से धोखे को उनकी गलती की तरह समझाएगा पर वो खुलकर नहीं कहेगा कि दिक्कत इसलिए है क्योंकि दोनों ने मुसलमानों का पक्ष लिया।

पक्ष यहां इसलिए लिखा क्योंकि ऐसा उनको लगता है। ये हिंदू चरमपंथियों का असली शोक है। रिकॉर्ड में और ऑफ रिकॉर्ड इस बाजे को हमने हजार बार बजते सुना है। थोड़ी बहस कीजिए और सबसे जटिल चरमपंथी का धागा खुल जाएगा। पटेल या राजेंद्र प्रसाद के प्रति इनकी उदारता इसीलिए है क्योंकि दोनों ही नेहरू के मुकाबले हिंदू रुझान के नेता थे जिन्होंने अपने सरकारी पदों को अपनी निजी श्रद्धा के सामने संकट खड़ा नहीं करने दिया। अगर नेहरू-गांधी 1947 के बाद मुसलमानों के खिलाफ हो जाते तो वो भी हिंदू चरमपंथ की ओर से उसी तरह माफ कर दिए जाते जैसे मुस्लिम चरमपंथियों ने जिन्ना को माफ किया था।

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अपनी मौत तक नेहरू-गांधी हिंदू चरमपंथ के चेहरों पर तनाव की लकीरें खींचे रहे। खत्म नहीं किया तो भी सत्ता का संरक्षण हासिल नहीं होने दिया। नेहरू ने प्रैक्टिसिंग हिंदू होकर भी अपने समकालीनों की देखादेखी नहीं की। सरकार के कामकाज से धर्म को दूर रखने की मिसाल कायम की। कालांतर में वो हिंदू चरमपंथ के सबसे बड़े खलनायक बन गए। कोई फर्क नहीं पड़ता कि नेहरू के पिता ने अंग्रेज़ों का सम्मान ठुकराकर उनकी दुश्मनी मोल ली हो। चाहे संघर्षरत कांग्रेस को अपना घर दान कर दिया हो। चाहे नेहरू ने जीवन के दस साल जेल में बिता दिए हों। चाहे नेहरू की पत्नी भी इसी संघर्ष में होम हो गई हों। चाहे नेहरू के पास पत्नी के इलाज को पैसे ना बचे हों। चाहे पीएम बनने के बावजूद उनकी बेटी खत लिखकर बता रही हो कि रोज कोई मेहमान घर आ जाता है इसलिए आपकी तन्ख्वाह में काम चल नहीं पा रहा है।

देश की आजादी से तीन दशक पहले ना नेहरू और ना गांधी जानते थे कि उनके संघर्ष का प्रतिफल क्या होगा। ये सोचकर कौन घर बर्बाद करता है कि कल तो प्रधानमंत्री बनना तय है। नेहरू तो खुद एक बार मान बैठे थे कि अब कभी जेल से निकलना नहीं हो पाएगा तब भी अड़े रहे।

बावजूद इसके नेहरू अय्याश, सत्तालोलुप और षड्यंत्रकारी ही रहेंगे। हिंदू चरमपंथी उनसे अपना बदला चुका कर रहेंगे। जो तथ्यों से बात रखेंगे वो नेहरू के मानसिक गुलाम कहे जाएंगे। एक बात तो साफ है.. नेहरू को कोसने वाले सारे कोसनाथों को पुरस्कार नहीं मिलेगा पर कुछ को मिलेगा मगर आज नेहरू पर फैलती अफवाहों को काटने वालों को तो अनंतकाल तक गाली ही मिलेगी। हम जैसों को सत्तासीन होनेवाले नेहरू-गांधियों की नीतिगत आलोचना करके “छिपे संघी” होने का प्रमाणपत्र भी तो लेना है लेकिन उससे पहले नेहरू के खिलाफ चलते दुष्प्रचार का जवाब देने का फर्ज़ निभा लें।

लोगों तक सच्ची जानकारी पहुंचनी चाहिए। गलत प्रचार नहीं। सही जानकारी मिलने के बाद वो चाहे जिसे पसंद – नापसंद करें ये उनका विवेक और बुद्धि है।

नितिन ठाकुर, TV9 भारतवर्ष

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