कन्हैया कुमार को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मुकदमा के धारा 124 A के इस्तेमाल पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने कन्हैया कुमार सहित अन्य लोगों पर चल रहे राजद्रोह मुकदमा के धारा 124 A के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने कहा कि राजद्रोह (धारा 124 A) का दुरुपयोग हो रहा है नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है.जिनके खिलाफ देशद्रोह के आरोप में मुकदमें चल रहे हैं और वो इसी आरोप में जेल में बंद हैं वो जमानत के लिए समुचित अदालतों में अर्जी दाखिल कर सकते हैं.क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार ने इस कानून पर पुनर्विचार के लिए कहा है, लिहाजा कोर्ट ने कहा है कि जब तक पुनर्विचार नहीं हो जाता तब तक इस कानून के तहत कोई कोई केस नहीं होगा. साथ ही लंबित मामलों में भी कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2015 से 2020 तक इसके तहत कुल 356 केस दर्ज हुए और 548 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इसमें 12 लोगों की सजा हुई। 2015 में कुल 35 केस दर्ज हुए और 48 लोगों की गिरफ्तारी हुई, 2016 में 51 केस और 48 गिरफ्तारी, 2017 में 51 केस और 228 गिरफ्तारी, 2018 में 70 केस और 56 गिरफ्तारी, 2019 में 93 केस और 99 गिरफ्तारी और 2020 में कुल 73 केस दर्ज हुए और 44 लोगों की गिरफ्तारी हुई।

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इस कानून के शिकंजे में फंसकर कई बड़े और चर्चित नेता जेल पहुंच गए। इनमें सितंबर 2012 में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, अक्टूबर 2015 में कांग्रेस नेता हार्दिक पटेल, फरवरी 2016 में कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार, फरवरी 2021 में कांग्रेस नेता अजय राय, अप्रैल 2021 में अमरावती की सांसद नवनीत राणा, अगस्त 2021 में सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क, सितंबर 2021 में यूपी के पूर्व राज्यपाल अजीज कुरैशी
और दिसंबर 2021 में धर्मगुरु कालीचरण शामिल हैं।

बुधवार की सुबह सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जब तक देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार नहीं हो जाता, राज्य और केंद्र सरकारें इस कानून के तहत मुकदमा दर्ज नहीं करेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आईपीसी की धारा 124ए के प्रावधानों पर फिर से विचार करने और पुनर्विचार करने की अनुमति दी है जो देशद्रोह को अपराध बनाती है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिनके खिलाफ देशद्रोह के मामले चल रहे हैं और वे जेल में बंद हैं, वे जमानत के लिए अदालत जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार का काम 3-4 महीने में पूरा कर लेने का सुझाव दिया है। इस महत्वपूर्ण सुनवाई के बाद उम्मीद की जा रही है कि वर्षों से विवाद का विषय बने इस कानून को लेकर अब कुछ ठोस फैसला हो सकेगा।

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