जमीन खरीद-बिक्री में नहीं चलेगा फर्जीवाड़ा, जमीन के हर प्लॉट का बिहार में होगा यूनिक नंबर

लगातार बारिश से बिगड़े हालात के कारण बुधवार से शुरू होने वाली जमीन रजिस्ट्रेशन की नई प्रक्रिया को फिलहाल टाल दिया गया है। मगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, गांधी जयंती के मौके पर जल-जीवन-हरियाली अभियान की शुरुआत करेंगे।

अब हर जमीन का अपना पहचान नंबर होगा। इसी 22 अंक के यूनिक नंबर से प्लॉट की पहचान होगी। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने इसके लिए कार्ययोजना बनायी है। कंप्यूटर पर इस नंबर के डालते ही इस प्लॉट से संबंधित सारी जानकारी सामने आ जाएगी। इस तकनीक से फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी। इस यूनिक नंबर में खाता नंबर, थाना नंबर, मौजा का नाम, अंचल व जिला के नाम के साथ उसके स्वामित्व की जानकारी होगी। उस प्लॉट पर यदि कोई मुकदमा है तो उसकी भी जानकारी एक क्लिक में मिलेगी। 22 अंकों में पहला दो नंबर जिला का कोड होगा जबकि आखिरी का दो नंबर म्यूटेशन के लिए आरक्षित होगा। बीच के शेष अंक अंचल, आरटी नंबर, खेसरा नंबर, होल्डिंग टाईप और जमीन के वर्गीकरण से संबंधित होगा। ऐसी व्यवस्था करने वाला बिहार पहला राज्य होगा।

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विशेषज्ञों की बैठक में अनुभव होंगे साझा : इस योजना को लागू करने के तौर-तरीके के मद्देनजर राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने 21 अक्टूबर को राजधानी में विशेषज्ञों की एक बैठक बुलायी है। इसमें सूबे के राजस्व एवं जीआईएस एक्सपर्ट के साथ ही दूसरे राज्यों के विशेषज्ञ भी भाग लेंगे। विशेषकर उत्तर प्रदेश के विशेषज्ञ अनुभव साझा करेंगे। यूपी में इस योजना को सफलतापूर्वक लागू किया गया है। अन्य राज्यों के तथ्यों को साझा कर बिहार में इस यूनिक आईडी को और भी उपयोगी और सूचनापरक बनाया जाएगा।

आखिरी के दो नंबर म्यूटेशन के होंगे : प्रोजेक्ट में लगे विशेषज्ञों के मुताबिक, यह यूनिक नंबर 22 अंकों का हो सकता है। इसमें पहला दो नंबर जिले का कोड होगा, जबकि आखिरी दो नंबर म्यूटेशन के लिए आरक्षित होगा। बीच के बाकी नंबर, अंचल, आरटी नंबर, खेसरा नंबर, होल्डिंग टाइप और जमीन के वर्गीकरण से संबंधित होंगे। इसमें संपत्ति का अंतरण (म्यूटेशन) की सटीक जानकारी होगी।

क्रम संख्या 17 एवं 18 में होल्डिंग टाइप के विकल्प रहेंगे, जिसमें रैयती, गैरमजरूआ खास, गैरमजरूआ आम, बकास्त, कैसरे हिन्द, खास महाल और जिरात प्रकृति दर्ज रहेगी। वहीं क्रम संख्या-19 एवं 20 पर भूमि का वर्गीकरण होगा, जिसमें कृषि, परती, आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक जैसे विकल्प होंगे। ऐसा होने पर जमीन का पूरा कच्चा चिट्ठा उपलब्ध हो जाएगा। ब्योरा हमेशा अपडेट रहने से उसका हिसाब-किताब रखने में सरकार को सुविधा होगी। साथ ही सरकारी जमीन पर अतिक्रमण रोकने और विवाद की स्थिति में इसका इस्तेमाल संदर्भ के रूप में किया जा सकेगा।

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