मजदूरों को उनके हाल पर मरने दीजिए, बसें भेजेंगे तो सरकार और मीडिया कहेगी विपक्ष राजनीति कर रहा है

ये मई-जून का महीना है। तपती गर्मी में सुबह से ही सूरज की तेज किरणें चुभने लगती है और दोपहर में मानो आग बरसा रही होती है
लेकिन इसी गर्मी में इस देश के सियासतदानों को वोट देने वाले गरीब मजदूर भूख और प्यास से तड़पते हुए घर लौट रहे है।

इन मजदूरों को सकुशल घर पहुंचाने के लिए सरकार के पास कोई गाइड लाइन नहीं है, कोई व्यवस्था नहीं है.. अगर थोड़ी बहुत है भी तो अखबारों के पन्नों पर छापे गए बड़े बड़े विज्ञापनों में सिमट कर रह गई है ।

हां, इतना जरूर है कि घर लौट रहे मजदूर ही इन हुक्मरानों की सल्तनत को संवारेंगे… लेकिन ये विधायक नहीं है। विधायक होते तो लगज़री बसों में बैठाकर किसी रिसोर्ट पर पहुंचा दिए गए होते। फाइव स्टार होटलों में करोड़ों में खेल रहे होते.. लेकिन ये ठहरे गरीब मजदूर जो इतने नालायक है कि केवल चुनावी हफ्तों में ही काम आते है बाद बाकी सब भूल जाते है…।

अभी ताज़ा बात सुनिए… औरैया में घर लौट रहे 24 प्रवासी मजदूर रोड ऐक्सिडेंट में मारे ( पढ़ें – शहीद ) गए. पैदल लौटने के क्रम में जान गंवाने वालों की संख्या फिलहाल 121 हो चुकी है।

अब मुख्य कहानी पर आते है.. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने घर लौट रहे मजदूरों के लिए यूपी बोर्डर पर बसें खड़ी करवा दीं। दावा किया गया कि 1000 बसें खड़ी की गईं है ताकि प्रदेश लौट रहे मजदूरों को उनके घर सकुशल पहुंचाया जा सके।

योगी ने क्या किया..? एक झटके में सब कैंसिल.. फिर चिठ्ठियों का खेल शुरू हुआ। प्रियंका गांधी ने चिट्ठी लिखी और बसों के लिए अनुमति मांगी… उन्होंने लिखा,
“आदरणीय मुख्यमंत्री जी, मैं आपसे निवेदन कर रही हूँ, ये राजनीति का वक्त नहीं है। हमारी बसें बॉर्डर पर खड़ी हैं। हजारों श्रमिक, प्रवासी भाई बहन बिना खाये पिये, पैदल दुनिया भर की मुसीबतों को उठाते हुए अपने घरों की ओर चल रहे हैं। हमें इनकी मदद करने दीजिए। हमारी बसों को परमीशन दीजिए।”

जैसे तैसे योगी ने प्रस्ताव को माना और कहा कि एक हज़ार बसों का नंबर दिखाईए, चालक/परिचालक की लिस्ट भेजिए..

अब यहां तक सब अच्छा जा रहा था.. कोई राजनीतिक पेंच नहीं.. तस्वीर अटैच करके ड्राइवरों और बसों कि लिस्ट भेज दी गई। प्रियंका गांधी ने फिर चिट्ठी लिखी जिसमें सरकार से बिना देर किए बसों को अनुमति देने की गुज़ारिश की गई।

अब एक दिन बीत चुका था..और साथ ही उत्तर प्रदेश प्रशासन और प्रियंका गांधी के बीच लेटर वॉर भी शुरू हो चुका था। यूपी सरकार के गृह सचिव की तरफ से चिट्ठी जारी कि गई जिसमें लखनऊ के वृंदावन योजना इलाके में सुबह 10 बजे तक 1000 बसों सहित उनके फिटनेस सर्टिफिकेट और ड्राइवर के लाइसेंस के साथ लखनऊ के डीएम को सौंपने के लिए कहा गया ।

जवाब में प्रियंका के सचिव ने कहा, “खाली बसों को लखनऊ बुलाना राजनीति से प्रेरित है. यह संसाधनों की बर्बादी है, जबकि हजारों लोग नोएडा-गाजियाबाद में फंसे हैं.”

इसका मतलब सीधे शब्दों में समझिए… योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं चाहती है कि प्रियंका गांधी वाड्रा मजदूरों को बसो से लाकर सूबे में वाह-वाही बटोरे.. नतीजा क्या होगा? कांग्रेस की शाख यूपी में तेज़ी से बनने लगेगी, योगी सरकार ख़तरे में आ जाएगी।

इस राजनैतिक दंगल में फंसा कोन है? कोई राजनेता? नहीं, सौ रुपए की दिहाड़ी कमाने वाला एक मजदूर.. गरीब मजदूर..! और मज़ा कौन लेे रहा है? इनकी गरीबी के नाम पर वोट पाकर सत्ता की मलाई चाट रहे नए नए चिंटू।

आज शाम क्या हुआ? योगी सरकार ने कहा, 1000 बसों में 994 बसों के काग़ज़ दुरुस्त है.. लेकिन छे गाड़ियों में ऑटो और अमुब्लेंस के नंबर जमा किए गए है। तो इन छे गाड़ियों के कारण पैदल लौट रहे मजदूर.. पैदल ही लौटेंगे, उनके लिए व्यवस्थित 994 बसों का कोई वजूद नहीं है। सरकार ने कहा, 1000 बसें खड़ी करवाना एक राजनैतिक साजिश है।

क्या समझे? राजनीति कोन कर रहा है? जवाब है प्रियंका गांधी.
क्यों? क्योंकि इस महिला को किसने कहा मजदूरों के दर्द को समझने के लिए? किसने कहा बसों के बंदोबस्त के लिए..जैसे चल रहा है चलने देती न.. मरने देती मजदूरों को.. सुरफुरू बनने की क्या आवश्यकता पड़ गई?

प्रियंका गांधी की गंदी राजनीति देखिए.. मजदूरों को लाने के लिए तो बसें भेज देती है लेकिन अपने विधायकों के लिए कभी बसों कि व्यवस्था नहीं करवा पाती है.. तभी तो आज अपने 2-2 राज्यों के जीते हुए विधायक चोर लुटेरों से करोड़ों में गंवा के बैठी है।

खैर, आप मजदूरों को उनके हाल पर मरने दीजिए, बसें भेजेंगे तो सरकार और मीडिया कहेगी विपक्ष राजनीति कर रहा है…

© प्रियांशु

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