आवाज चली गई, कोरोना भी हुआ, लेकिन हारे नहीं, ऑक्जीन बैंक शुरू कर लोगों को दिया नया जीवन

Desk: बाजार समिति के पास रहने वाले आशीष के 70 वर्षीय पिता को कोरोना हो गया। सांस उल्टी चलने लगी। बहुत परेशान हुए, पर कहीं से ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं मिला। कोई रास्ता नहीं सूझा तो बीमार पिता को लेकर गौरव राय के घर पहुंच गए। उन्हें ऑक्सीजन लगाया गया और जान बच गई।

ऐसी कई कहानियां गौरव के पटना स्थित ऑक्सीजन बैंक से जुड़ी हैं। फोन रात में आए या दोपहर में, अपनी कार में सिलेंडर लेकर वे निकल पड़ते हैं। उन्होंने इतने लोगों की टूटती सांसों को गति दी कि लोग अब उन्हें ‘ऑक्सीजन मैन’ के नाम से पुकारते हैं। दूसरों को खुशियां देने वाले गौरव ने बहुत तकलीफें झेलीं। लॉकडाउन के समय आवाज चली गई थी, कोरोना भी हुआ, लेकिन हारे नहीं। ऑक्सीजन बैंक शुरू करने की ठानी तो उसे साकार करके दिखाया।

1870 ऑक्सीजन सिलेंडर से 986 लोगों की जान बचाई
कोरोना जब पीक पर था, उस समय किसी मरीज को जब हॉस्पिटल भर्ती नहीं ले रहे थे, पूरे देश में लॉकडाउन था, वैसे समय में पटना के गौरव राय लोगों के घर पर जाकर ऑक्सीजन सिलेंडर पहुंचा रहे थे, बिना एक पैसा लिए। वे कहते हैं मुझे सबसे ज्यादा खुशी उस समय होती, जब लोग यह कहते हुए सिलेंडर लौटाते हैं कि इसी सिलेंडर की वजह से जान बच गई। गौरव के ऑक्सीजन सिलेंडर ने कोरोना काल में दर्जनों लोगों की जान बचाई। उन्होंने कोरोना काल में 1870 सिलेंडर भरवाए और लोगों की टूटती सांसों को बचाया। अब तक 986 लोगों को सिलेंडर उपलब्ध कराए। कई ऐसे लोग हैं, जिन्हें कई दिनों तक लगातार सिलेंडर पहुंचाना पड़ा। बिहार फाउंडेशन को पता चला तो फाउंडेशन ने 200 सिलेंडर दिए।

इस घटना से ऑक्सीजन बैंक शुरू करने की ठानी
14 जुलाई 2020 को गौरव को सांस लेने में दिक्कत हुई। एंबुलेंस के लिए कोशिश की तो वह नहीं आया। वे खुद कार से शाम 6 बजे PMCH के लिए घर से निकले। स्थिति यह थी कि दो-तीन हाथ आगे ठीक से दिख नहीं रहा था। PMCH पहुंचे तो टाटा वार्ड में जमीन पर जाकर बैठ गए। बेहोशी टूटी तो पाया कि वे टाटा वार्ड के बाहर नाले के पास पड़े हुए थे और उनकी नाक में ऑक्सीजन लगा हुआ था। तय किया कि घर जाएंगे और घर पर ही कोरोना से लड़ेंगे। सुबह 3 बजे PMCH से घर लौटे और घर पर ही इलाज कर ठीक हुए। उसी दिन ठान ली कि सरकार को कोसने से अच्छा है ऑक्सीजन के लिए लोगों की मदद की जाए। गौरव ने तय किया कि ऑक्सीजन के लिए किसी से पैसे नहीं लेंगे। पत्नी ने 3 सिलेंडर खरीदे। रतन रत्नेश ने एक लाख रुपए भेज कर मदद की। 20 जुलाई को 13 सिलेंडरों के साथ ऑक्सीजन बैंक की यह मुहिम शुरू हो गई, जिसमें जिद थी कि सांस को टूटने नहीं देंगे। क्राउड फंडिंग से तीन लाख रुपए आ गए। अभी बिहार के 21जिलों में यह बैंक चल रहा है।

सुसाइड करने लगे पर अंदर ऑक्सीजन बैंक चलाने की जिद थी
इससे पहले भी गौरव को समय ने हराने की खूब कोशिश की, लेकिन वे खुद को संभाले रहे।19 अक्टूबर 2019 को उन्हें डेंगू हुआ था और हॉस्पिटल में भर्ती हुए। आवाज ही चली गई। कई डॉक्टरों ने अलग-अलग बीमारी बताई। लेकिन, आखिरकार पता चला कि उन्हें वोकल कॉड पाइरेलाइसिस है। वे इतने डर गए कि सुसाइड करने का मन बना लिया। पुल तक पहुंच भी गए, लेकिन उनके अंदर के उस आदमी ने उन्हें बचा लिया, जिसने 5 साल की उम्र में नाले में उतरकर कुत्ते के बच्चे को मरने से बचा लिया था। कोरोना काल में जब गौरव लोगों की मदद कर रहे थे, उस समय तक भी उनकी आवाज ठीक से नहीं निकल रही थी। गौरव की उम्र 50 साल है और वे 88 बार ब्लड डोनेट कर चुके हैं। 6 बार प्लाज्मा दे चुके हैं। जब 16 साल के थे, तब पहली बार ब्लड डोनेट किया था।

मरीज के ठीक होने पर केक लेकर सेलिब्रेट करने पहुंचते हैं
गौरव को एक-एक मरीज की कहानी याद है। कोरोना काल में दिल्ली, धनबाद, बोकारो, ग्वालियर, भागलपुर के कोरोना मरीजों के लिए सिलेंडर भेजे। एक सिलेंडर भराने में 250 रुपए लगते हैं, लेकिन कुमार इंटरप्राइजेज के अजीत कुमार ने 100 रुपए में ऑक्सीजन उपलब्ध कराकर मदद की। गौरव ने कोरोना काल में लोगों के बीच 300 ऑक्सीमीटर भी बांटे। एक मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की पत्नी को कोरोना हो गया था। उन्हें 45 सिलेंडर उपलब्ध कराए। जब ठीक हुईं तो उनके घर केक लेकर खुशी सेलिब्रेट करने पहुंचे। उनकी बेटी ने कहा हम भी आपको कुछ गिफ्ट करना चाहते हैं अंकल। यह कहते हुए उसने एक गुलाब का फूल लाकर गौरव राय को दिया। गौरव की आंखें भर आईं।

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