मुकेश साहनी तो गियो, अब नीतीश की बारी है, गिरिराज या शहनवाज़ हुसैन को बनाया जा सकता है CM

बिहार की राजनीति नई करवट लेने की ओर है। आज के राजनीतिक घटना क्रम की स्क्रिप्ट चुनाव नतीजों के दिन ही 2020 में लिख गई थी। हालांकि आज जो हुआ वो कुछ दिन बाद होने वाला था। लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव ने उसे समय से पहले करवा दिया है। अब बिहार में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी हो गई है। जीते 74 विधायक थे । अब तीन विधायकों के आने से संख्या 77 हो गई है। जो मौजूदा विधान सभा में राजद के 75 से ज्यादा है। अब ये महज एक संख्या नहीं बल्कि बदलाव की पहली सीढ़ी है।

आज के घटना क्रम की टाइमिंग देखिए। सुबह बिहार के बीजेपी सांसदों की पीएम से मुलाकात हुई और शाम को एक पार्टी विधान सभा में खत्म हो गई। मीडिया उत्तर प्रदेश शपथ की खबर में डूबा है जिससे बिहार की खबर को तवज्जो नहीं मिली। बीजेपी के बिलकुल सही वक्त।

मुकेश सहनी अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं। उनकी राजनीतिक समझ शून्य है। पैसा होना ही मजबूत नेता बनने का लक्षण नहीं है। 2015 में राजनीतिक पार्टी बनाकर बीजेपी को समर्थन दिया। फिर 2019 के चुनाव में राजद के साथ गठबंधन कर लिया। हारे हुए राजद के रणनीतिकारों को लग गया कि रैली में बुलाई गई भीड़ वोटरों की है। लिहाजा तीन लोकसभा सीट दे डाली लड़ने को। जबकि इस पार्टी की राजनीतिक हैसियत एक विधान सभा भी लड़ने की नहीं थी। खैर, जैसे तैसे उम्मीदवारों को उतारकर कोरम पूरा किया और जनता ने सही जगह भेज दिया।

इनकी हैसियत का अंदाजा राजद को मालूम हो गया था। लेकिन इनको चस्का चढ़ा था। खुद को डिप्टी सीएम मान कर चल रहे थे। तेजस्वी ने लालू यादव के कहने पर तीन से पांच सीट विधानसभा की, लड़ने का ऑफर दिया वो भी लालटेन के सिंबल पर। प्रेस कांफ्रेंस छोड़कर कैसे भागे दुनिया ने देखा।

कोई पूछ नहीं रहा था। बीजेपी उस वक्त सीट को लेकर जेडीयू से डील कर रही थी। ज्यादा सीट लेने और पिछड़ों की गोलबंदी के नाम पर इनको अपने खाते में ले लिया। अच्छी डील मिल गई। 11 सीट लड़ने को मिली। लेकिन फिर वही हाल। उम्मीदवार तक नहीं था। खुद लड़ा तो हार गए। जो चार सीट जीती, उसमें से तीन बीजेपी के दिए borrow उम्मीदवार थे। एक जेडीयू के। जेडीयू वाले मुसाफिर पासवान का ही निधन हुआ है जिसकी वजह से चुनाव हो रहा है।
खैर 2020 में जीत के दिन तय हो गया था कि देर सवेर सब बीजेपी में जायेंगे। और वो देर सवेर बुधवार को हो गया।

नदी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं करनी चाहिए। ये छोटी सी बात ये समझ नहीं पाए। अब जुलाई में इनका खुद का कार्यकाल खत्म हो रहा है। मतलब विधान परिषद का सदस्य नहीं रह पाएंगे। अब तो बीजेपी रहने भी नहीं देगी। मंत्री नीतीश कुमार बना कर रख पाएंगे ऐसी राजनीतिक हैसियत उनकी है नहीं। सो एक दो दिन में इनसे नीतीश कह देंगे कि इस्तीफा देकर घर बैठ जाइए।

मुकेश सहनी ने पहली गलती नीतीश कुमार से हाथ मिलाकर की, दूसरी गलती यूपी में चुनाव लड़कर, तीसरी गलती विधान परिषद में उम्मीदवार देकर। चौथी गलती उपचुनाव में उम्मीदवार उतारकर। पांचवीं गलती तेजस्वी यादव और लालू यादव के साथ सिंपैथी दिखाकर।
गलती पर गलती।

बीजेपी ने मंत्री बना कर सम्मान दे दिया ये बहुत बड़ा राजनीतिक उपकार किया। लेकिन ये इस बात को बीजेपी की मजबूरी समझ बैठे। अब बीजेपी प्रयोग नहीं कर रही। बीजेपी अपना सीएम बनाने का मन बना चुकी है। गिरिराज सिंह को बिहार में बिठाना और दो दिन पहले नित्यानंद राय की नीतीश से मुलाकात सब स्क्रिप्ट का हिस्सा है।

सीएम कौन होगा इसको लेकर नीतीश को राजी करने की कोशिश है। ऐसा लगता है कि बाकी फार्मूला तैयार कर लिया गया है।

मनोज का मूड, FB पेज

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