तेजी से हो रहा बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव, नीतीश को क्या अपने क्या पराये सब हराना चाहते हैं

बिहार में पहली बार दलित राजनीति एक अलग नेरेटिव के सहारे सत्ता पर पकड़ बनाने के लिए फ्रंटफुट पर खेलने कि तैयारी कर रहा है और निशाने पर नीतीश है । कल तक चिराग पासवान नीतीश पर हमलावर थे और आज बिहार के अधिकांश वैसे दलित नेता जिनकी राजनैतिक पहचान रही है वो नीतीश पर हमलावर है।
यू कहे तो बिहार में पिछले 30 वर्षो से जारी राजनीति से अलग दलित राजनीति के सहारे एक ऐसे नेरेटिव को सेट करने कि कोशिश शुरु हुई है जिससे नीतीश,लालू और सुशील मोदी की राजनीति से बिहार बाहर निकल सके हलाकि इस बार के चुनाव में यह कोशिश कितना रंग लायेगा कहना मुश्किल है लेकिन इस नेरेटिव का
बिहार की राजनीति में बड़ा प्रभाव पड़ेगा ।

1–चिराग नीतीश पर हमलावर क्यों है…
बिहार की राजनीति में रामविलास पासवान चाहे वो लालू के साथ रहे हो या फिर एनडीए के साथ सत्ता में साझेदारी को लेकर कभी समझौता नहीं किया है। अपने लाँबी के अधिकारियों के पोस्टिंग का मामला हो या फिर बोर्ड निगम में हिस्सेदारी का मामला हो। जिसके साथ रहते हैं उससे पूरी किमत वसूल करते हैं नीतीश के साथ टकराव कि एक वजह ये भी है लोजपा बीजेपी कि तरह अधिकारियों के तबादले और पोस्टिंग के मामले में नीतीश को फ्री हेंड देने को तैयार नहीं है ।
जब तक नीतीश रामविलास के सहारे बीजेपी को घेरने कि रणनीति में लगे रहे तब तक रामविलास पासवान से रिश्ता बना रहा है और उनके अनुसार बिहार में लोजपा को हिस्सा भी मिलता रहा ।

लेकिन जैसे ही नीतीश को लगा कि रामविलास पर दाव नहीं बैठ रहा है नीतीश रामविलास को किनारा करने लगे और फिर एक समय ऐसा आया जब नीतीश रामविलास पासवान का फोन तक उठाने से मना कर दिये और इस स्थिति में रामविलास पासवान के पास बगावत करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था क्यों कि रामविलास जिस जाति से आते हैं बिहार में उसकी आक्रमक छवि है और ये हमेशा अपने नेता में भी वैसे ही छवि देखने का आदी रहा है ।

वैसे भी नीतीश कुमार बिहार में महादलित का जो नेरिटिव चलाये थे वो रामविलास पासवान को कमजोर करने के लिए ही था और उसमें नीतीश कुमार को जबर्दस्त कामयाबी भी मिली थी और इस वजह से रामविलास पासवान जैसे मजबूत दलित नेता की पूरी राजनीति ही हासिए पर चली गयी थी । चिराग इस खतरे को समझ रहा है कि सांसद के सहारे बिहार में लोजपा की राजनीति चल नहीं सकती है ऐसे में विधानसभा चुनाव में जब तक मजबूत भागीदारी नहीं रहेगी पार्टी की पकड़ पहले जैसे नहीं हो पायेगी औऱ यही वजह है कि लोजपा 40 से कम सीट पर लड़ने को तैयार नहीं है और बीजेपी भी चाहती है कि लोजपा को 40 सीट मिले ताकी नीतीश चुनाव बाद आँख ना दिखा सके ।

ये सारा खेल इसी के लिए हो रहा है वैसे नीतीश रामविलास पासवान को लेकर पहले से अब जरा सोफ्ट हुए हैं वजह साफ है बिहार के दूसरे बड़े दलित नेता नीतीश के खिलाफ गोलबंद होने लगे हैं इसका लाभ रामविलास की पार्टी को मिल जाये तो कोई बड़ी बात नहीं होगी ।

2—राजद की दलित राजनीति तुरुप का इक्का साबित होगा?
श्याम रजक ,उदय नारायण चौधरी ,शिव चन्द्र राम जैसे दलित नेताओं के सहारे नीतीश को घेरने कि जो कबायत राजद ने शुरु कि है उसका असर बिहार विधानसभा चुनाव पर कितना पड़ेगा कहना थोड़ा मुश्किल है ।

लेकिन एक इस नेरेटिव से जदयू और भाजपा दोनों असहज महसूस जरुर करने लगे हैं ।क्यों कि जदयू और भाजपा लालू और लालू के परिवार पर जितनी सहजता और आक्रामकता के साथ घेराबंदी करने में कामयाब हो जाते हैं इन दलित चेहेर के सामने आने के बाद दोनों पार्टी के जो फायर ब्रांड प्रवक्ता हैं वो अहसज है।
यहां तक की सुशील मोदी भी जबाव नहीं दे पाये जदयू कि और से अशोक चौधरी और मंत्री निराला आये भी तो वो प्रभाव नहीं छोड़ पाये जो इन नेताओं ने छोड़ा है।
इस निरेटिव से थोड़ा मनोवैज्ञानिक बढ़त जरुर राजद को मिलता हुआ दिख रहा है लेकिन उसका लाभ चुनाव में राजद कैसे उठाता है सब कुछ उसी पर निर्भर करेगा क्यों कि राजद से सबसे पहले बिहार में दलित वोटर ही बाहर निकला था और फिर पिछड़ा ,दलित और मुस्लिम का जो एक अवैध किला लालू प्रसाद ने खड़ा किया था वो किला ढहने लगा था ।

देखिए आगे आगे होता है क्या लेकिन राजद के इस दलित राजनीति से चिराग का एनडीए में महत्व बढ सकता है वहीं महागठबंधन से बाहर आये जीतनराम मांझी एक बार फिर औंधे मुंह गिर जाये तो कोई बड़ी बात नहीं होगी । क्यों कि बीजेपी का केन्द्रीय नेतृत्व जिस तरीके से लोजपा के साथ खड़ी है फिर बिहार के दलित नेता जिस तरीके से नीतीश की घेरेबंदी शुरु कर दी है ऐसे में नीतीश के लिए अब लोजपा को नज़रअंदाज़ करना सहज नहीं होगा ।

Santosh singh, Kashish News

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