बीच सभा में नीतीश ने दिखाई PM मोदी और अमित शाह को उसकी औकाद, एक मंत्री पद पर नहीं किया समझौता

PATNA : सबसे आसान होता है दूसरों की बात को मान लेना और सबसे कठिन होता है अपनी शर्तों पर चलने का प्रयास करना। अंतिम समय में मोदी मंत्रिमंडल में जदयू के नहीं शामिल होने के निर्णय पर भले लोग नीतीश कुमार को पलटू या जो भी कहें, लेकिन नीतीश ने फिर से साबित किया कि वे बिना रीढ़ वाले नहीं हैं।

एक योग्य नेता की यह भी निशानी है कि वह राज्य हित में अपनी बात पर अड़ा रहे। नीतीश ने इसे साबित किया है। ऐसे भी जब लोकसभा चुनाव हुए थे तब वह एनडीए के बैनर तले लड़ा गया था, भले देश में चेहरा मोदी हों। तो बिहार में चेहरा नीतीश ही थे। मोदी और नीतीश के साझा करश्मिे का ही नतीजा था कि एनडीए ने ४० में ३९ सीटों पर जीत हासिल की। तो स्वाभाविक है मंत्री पद मोदी-शाह के फॉर्मूले का विरोध करना नीतीश का वाजिब हक था। सवाल वाजिब है कि आखिर जदयू सांकेतिक रूप से मंत्रिमंडल में शामिल क्यों हो?

NITISH KUMAR, MODI CABINET, DAILYBIHAR, DAILYBIHAR.COM

नीतीश ने कुछ न सही कम से कम मोदी-शाह को भरी सभा में सार्वजनिक रूप से उनकी औकाद तो दिखाई ही है। ऐसे भी मौजूदा दौर में मोदी-शाह के निर्णय के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग गिनती के ही हैं। उसमें भी एनडीए में रहकर नीतीश का यह निर्णय उनके साहस और राज्य के आत्मसम्मान के लिए संघर्ष को दर्शाता है।

स्वाभिमान की कसौटी पर सत्ता से समझौता करना सरल नहीं होता। मोदी-शाह को भी शपथ की शाम ही यह पता चल गया कि फिलहाल वे एनडीए की सत्ता चला रहे हैं और सहयोगियों का सम्मान ही उनकी शक्ति को बढ़ाएगा। खैर उम्मीद करें, नीतीश अपने मनमाफिक मंत्री पद झटक ही लेंगे।

लेखक : प्रियदर्शन शर्मा, पत्रकार, पत्रिकार

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *