नोटबंदी की 5वीं बरसी पर जानें क्यों ‘गायब’ हुए 2000 के नोट? छपाई भी हो चुकी है बंद

भारतीय अर्थव्यवस्था में 2,000 रुपये के नोटों की संख्या, 2017-18 की तुलना में करीब एक चौथाई कम हुई है। आपको बता दें कि नोटबंददी के बाद यह 33,630 लाख के अपने चरम पर पहुंच गई थी, जो कि मार्च 2021 में घटकर 24,510 लाख हो गई है। अगर मूल्यों में देखें तो यह उस समय करीब 6.72 लाख करोड़ रुपये था, जो अब घटकर 4.90 लाख करोड़ रुपये हो गया है।

प्रचलन से हटाए गए 2,000 रुपये के नोटों की संख्या 9,120 लाख है, जिनकी कुल कीमत 1.82 लाख करोड़ रुपये है। इसका मतलब है कि 2,000 रुपये के नोटों की संख्या में 27 फीसदी की गिरावट आई है है।

कहां गए वो 2,000 रुपये के नोट?
आरबीआई की ताजा सालाना रिपोर्ट इन नोटों के बारे में कुछ नहीं कहती है। जाहिर है, आरबीआई ने 2,000 रुपये के नए नोटों की छपाई बंद कर दी है क्योंकि ये उच्च मूल्य के नोट बैंकों में वापस नहीं आ रहे हैं। एटीएम में भी लोगों को पहले की तरह 2,000 रुपये के नोट नहीं मिल रहे हैं। इस बात की प्रबल संभावना है कि इन नोटों की कीमत अधिक होने के कारण काले धन के रूप में जमा किया गया हो।

नोटबंदी के समय भी काले धन का अनुमान लगभग 4-5 लाख करोड़ रुपये था, जो विशेषज्ञों का मानना ​​था कि यह सिस्टम में वापस नहीं आएगा।

आरबीआई ने बाजार में कम मूल्य के नोटों की संख्या बढ़ा दी है। RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, प्रचलन में बैंकनोटों के मूल्य और मात्रा में क्रमशः 16.8 प्रतिशत और 7.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो कि 2020-21 के दौरान क्रमशः 14.7 प्रतिशत और 6.6 प्रतिशत की वृद्धि के मुकाबले 2019-20 के दौरान देखी गई।

500 रुपये और 2,000 रुपये के बैंक नोटों की हिस्सेदारी 31 मार्च, 2021 तक प्रचलन में बैंकनोटों के कुल मूल्य का 85.7 प्रतिशत थी, जबकि 31 मार्च, 2020 को यह 83.4 प्रतिशत थी। इससे यह साफ है कि 2,000 रुपये के नोट की जगह 500 रुपये के नोट ले रहे हैं। मात्रा के लिहाज से, 500 रुपये के मूल्यवर्ग में 31.1 प्रतिशत की उच्चतम हिस्सेदारी थी।

बैंक नोटों की कुल मात्रा में 500 रुपये मूल्यवर्ग के बैंक नोटों की हिस्सेदारी 31 मार्च, 2019 को 19.8 प्रतिशत से बढ़कर 31 मार्च, 2020 तक 25.4 प्रतिशत और 31 मार्च, 2021 को 31.1 प्रतिशत हो गई।

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