GST के दायर में पेट्रोल-डीजल को लाने से मोदी सरकार का इंकार, 134% टैक्स ले रही है सरकार

SUSHIL MODI(BJP RAAJYASABHA MP FROM BIHAR) : पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों का कड़वा सच : कर में कटौती की गई, तो राज्यों में गरीबों के कल्याण की तमाम योजनाएं बुरी तरह प्रभावित हो जाएंगी। विकास पटरी पर लौट आए और कच्चे तेल की कीमत घट जाए, तो पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत लाने पर विचार किया जा सकता है।

जब-जब पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य में अप्रत्याशित वृद्धि होती है, तब-तब मांग उठती है कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल किया जाए। हाल में केरल उच्च न्यायालय के निर्देश पर जीएसटी कौंसिल की लखनऊ में आयोजित 45वीं बैठक में केंद्र व राज्यों ने पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के निर्णय को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया। अभी पेट्रोल के आधार मूल्य पर 134.37 प्रतिशत तथा डीजल के आधार मूल्य पर 116.32 प्रतिशत कर व सेस वसूला जाता है और कुछ लोगों की कोशिश है कि पेट्रोल-डीजल पर जीएसटी की अधिकतम दर 28 प्रतिशत लगाई जाए।

पेट्रोलियम पदार्थों को यदि जीएसटी (28 प्रतिशत दर) के दायरे में लाया जाता है, तो केंद्र व राज्य सरकारों को पेट्रोल पर 106.3 प्रतिशत एवं डीजल पर 88.32 प्रतिशत कर/सेस का नुकसान होगा। लगभग 4.27 लाख करोड़ रुपये के राजस्व की क्षति होगी, जिसमें पेट्रोल पर 1.9 लाख करोड़ व डीजल पर 3.19 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। क्या सरकारें इतने बड़े राजस्व की क्षतिपूर्ति किसी अन्य माध्यम से कर पाएंगी? गरीबों के कल्याण और विकास योजनाओं के लिए धन कहां से आएगा? जीएसटी में शामिल कर दिया जाए, तो अधिकतम 10.72 रुपये पेट्रोल से एवं 10.90 रुपये डीजल से प्राप्त होंगे। 6 मई, 2021 को केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर ‘सड़क एवं आधारभूत संरचना सेस’ को 10 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 18 रुपये कर दिया है। केंद्र सरकार को सड़क सेस से 2020-21 में 2.24 लाख करोड़ रुपये राजस्व प्राप्त हुआ था। इस रोड सेस से 2020-21 में 59,622 करोड़ रुपये सड़क मंत्रालय द्वारा सड़क निर्माण में खर्च किए गए। वर्ष 2021-22 में इस सेस से 50 हजार करोड़ रुपये जल जीवन मिशन के अंतर्गत हर घर नल जल योजना व 79,147 करोड़ सड़क निर्माण एवं शेष राशि रेलवे, जहाजरानी, उड्डयन, ऊर्जा एवं अन्य आधारभूत संरचनाओं के निर्माण पर व्यय किया जाएगा। रोड सेस की एक बड़ी राशि राज्यों को भी सड़क निर्माण हेतु स्थानांतरित की जाती है।

इसी प्रकार केंद्र सरकार ने 2 फरवरी 2021 से 2.50 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल एवं 4 रुपये प्रति लीटर डीजल पर कृषि आधारभूत संरचना सेस लगाने का निर्णय लिया था। पर इसका प्रभाव उपभोक्ता पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि सरकार ने कृषि सेस राशि के समतुल्य एक्साइज डॺूटी को कम कर दिया है। इस कृषि सेस से 30 हजार करोड़ रुपये राजस्व का अनुमान है, जो कृषि मंडियों व कृषि की आधारभूत संरचनाओं पर व्यय होगा।

एक और अहम बात। पेट्रोलियम पदार्थों पर वैट राज्यों की आय का प्रमुख स्रोत है। राज्यों को औसतन 18.55 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल एवं 13.46 रुपये प्रति लीटर डीजल से राजस्व प्राप्त होता है। आंध्र प्रदेश (41 प्रतिशत), महाराष्ट्र (39 प्रतिशत), राजस्थान (38 प्रतिशत) पेट्रोल पर सर्वाधिक प्रभावी वैट कर वाले राज्यों में हैं और गुजरात, हरियाणा, झारखंड 26 प्रतिशत वैट के साथ कम कर वाले राज्यों में हैं।

राज्यों की आय का बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम पदार्थों पर कर से आता है। अब यदि इस राजस्व में भारी कटौती होती है, तो राज्यों में गरीबों के कल्याण की तमाम योजनाएं बुरी तरह प्रभावित हो जाएंगी। कोरोना काल (2020-21) में लॉकडाउन तथा महामारी के कारण केंद्र और राज्यों में 4.65 लाख करोड़ रुपये कम राजस्व संग्रह हुआ। रोजगार भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ। रोजगार पैदा करने हेतु निर्माण कार्यों अर्थात पूंजीगत व्यय को बढ़ाना जरूरी है। कोरोना काल में भी निर्माण कार्यों में तेजी आई, क्योंकि सरकार के पास इसके लिए राजस्व था। केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर कर/सेस कम करना या जीएसटी के तहत लाना चाहती हैं, परंतु यदि वे कर में कटौती करती हैं, तो गरीब के कल्याण और विकास योजनाएं प्रभावित होंगी।

पूरी दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थ, शराब और तंबाकू पर सर्वाधिक कर लगाया जाता है। यूरोपीय संघ के देशों में भी पेट्रोलियम पदार्थों पर 45 से 60 प्रतिशत तक कर है। भविष्य में कच्चे तेल की कीमत में कमी आती है तथा कॉरपोरेट कर, आयकर, जीएसटी आदि करों से राजस्व पटरी पर लौट आता है, तो सरकारों को पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के तहत लाने पर विचार करना चाहिए।

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