रवीश कुमार जो रोज गालियां सुनकर भी रास्ते पर डटे रहे,बेरोजगारों की समस्या गरीबी पर सच बोलते रहे

PATNA: जब से वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को ramon magsaysay award से सम्मानित करने की खबर सामने आई है, सोशल मीडिया पर उनके फैन्स की तरफ से बधाई देने का सिलसिला जारी है। फेसुबक, इंस्टाग्राम, ट्वीटर..सोशल जगत से रवीश कुमार की तारीफ हो रही है।  फैन्स का कहना है कि रवीश कुमार जो रोज जान से मा’रने की ध’मकी और भद्दी भद्दी गा’लियां सुनकर भी अपने रास्ते पर डटे रहे। बेरोजगारों की समस्या और गरीबी पर सच बोलता रहे, वह इस सम्मान के लिए असली हकदार हैं। सच कहने का साहस और आलोचना के विवेक की मशाल को जिंदा रखने वाले पत्रकार रवीश कुमार को रमन मैग्सेसे पुरस्कार मिलने पर डेली बिहार की तरफ से बधाई।

सोशल मीडिया पर बधाई मिलने के बाद रवीष कुमार ने दर्शकों को धन्यवाद कहा। उन्होंने कहा कि आज आपको शुक्रिया कहने का दिन है। आपका होना ही मेरा होना है। मेरे जैसों का होना है। आज आप दिन भर बधाइयां भेजते रहे। मेरा कंधा कम पड़ गया है। आप सभी अच्छे दर्शकों का शुक्रिया। आपके जैसा दर्शक होना, आज के समय में दुर्लभ होना है। आपने मेरे कार्यक्रमों को देखने के लिए कितना कुछ छोड़ा होगा।

हिन्दू मुस्लिम डिबेट नहीं देखते होंगे, एंकर की खूंखार भाषा से दूर रहते होंगे। जब भी सूचना गायब हो जाएगी, सूचना लाने की पत्रकारिता समाप्त हो जाएगी, तब भाषा में हिं’सा ही बचेगी। इसलिए आप देखते होंगे कि एंकर ललकार रहे हैं। वो पूछ नहीं रहे हैं, बल्कि पूछने वाले को ललकार रहे हैं। जो पूछता है वह अपना सब कुछ दां’व पर लगाता है। वह सत्ता के सामने होता है। ऐसे में पत्रकारिता का काम है उसे सहारा दे ताकि वह और पूछ सके और पूछने पर नुकसान न हो। लेकिन हो रहा है उल्टा। पूछने वाले को दे’शद्रो’ही बताया जाता है। आप देखेंगे कि बहुत से लोग इस डर के कारण पूछने से बचते हैं। यह अच्छा नहीं है। सत्ता में भी हमारे ही लोग बैठे हैं। आप चाहें जो कह लें, आज जो चैनलों में हो रहा है वो पत्रकारिता नहीं है।

इसलिए कहने का मन कर रहा है कि आपको कोई गिन नहीं सकता है। मुझे ज़ीरो टीआरपी वाला एंकर कह सकता है मगर आप एक दर्शक हैं और आप ज़ीरो नहीं हैं। दर्शक को गिना नहीं जा सकता है। जब तक एक भी दर्शक ऐसा है जो किनारे खड़े होकर चीज़ों को देख रहा है, तब तक तथ्यों के बचे रहने की संभावना है। अगर आप एक भी हैं तो भी आपको बधाई। संख्या से दर्शक तय नहीं होता है। दर्शक बनता है देखने से। देखने के सब्र से। देखने की नजर से। आप देखिए, कितने सारे चैनल हैं। सब का कटेंट एक सा है।

कभी मैंने प्राइम टाइम में टीवी का कुआं बनाया था। ईंट की जगह टीवी के स्क्रीन लगे हैं। हर चैनल पर एक ही कटेंट है। एक ही ख़बर है। आप चैनल बदल सकते हैं मगर चैनल के बदलने से डिबेट का टॉपिक नहीं बदल जाता है। अनगिनत चैनल का मतलब अनगिनत सूचना नहीं है। अब अनगिनत चैनलों पर एक ही सूचना है, एक ही बहस है। रिमोट से आप चैनल बदल सकते हैं मगर चैनल बदल कर आप नई सूचना हासिल नहीं कर सकते हैं। ऐसा क्यों है, कभी इस पर सोचिएगा। इस तरह एक दर्शक कुएं में घिर जाता है। वह बंद हो गया है। तभी कहता हूं कि आप ऐसे दर्शक नहीं हैं। हर तरफ एक ही कटेंट है। वही टॉपिक है जो बार बार लौट कर आता है। मगर आप लोगों ने अलग देखने का फैसला किया है। आज की भीड़ में अलग होना, अलग दिखना कितना मुश्किल है, मैं समझता हूं, इसलिए आपका शुक्रिया अदा करता हूं। आप चैनलों से घिरे दर्शक की तरह नहीं हैं। आप आज़ाद दर्शक हैं। इस कुएं से डरिए। बाहर निकलिए और देखिए।

 

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