जो जिंदा में ऑक्सीजन नहीं दे पाए , वो मरने के बाद 4 लाख कैसे दे… SC बोला-मदद पाना मुश्किल

कोरोना महामारी की वजह से जान गंवाने वालों के परिजनों को 4-4 लाख रुपए का मुआवजा देने की मांग करने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने सभी पक्षों को कहा है कि अपनी लिखित दलीलें तीन दिन के भीतर जमा करा दें। इससे पहले दिन में चली बहस के दौरान केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि सरकार के पास मुआवजे के लिए फंड की कमी नहीं है। मगर केंद्र का फोकस आपदा से लोगों को राहत देने और बचाव के इंतजामों का प्रबंधन करने पर है। बहस पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमीनी हकीकत काफी अलग है। पीड़ितों के लिए मदद हासिल करना मुश्किल है। हमारी प्राथमिकता आम आदमी है। कोर्ट ने कहा कि मृत्यु प्रमाण पत्र पाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है, इसे सरल बनाया जाना चाहिए। साथ ही जिन पीड़ितों के डेथ सर्टिफिकेट पर मौत का कारण कोरोना नहीं लिखा गया, उनके लिए क्या हो सकता है इस पर कोर्ट विचार करेगी।

कोर्टरूम लाइव: जस्टिस भूषण बोले-मृत्यु प्रमाण पत्र की प्रक्रिया बेहद जटिल, जिनके डेथ सर्टिफिकेट पर कोरोना नहीं लिखा उनके लिए हम विचार करेंगे
एसबी उपाध्याय (याचिकाकर्ता गौरव बंसल व रीपक कंसल के वकील): एनडीएमए की धारा 12 के तहत आपदा में मृतकों को मुआवजे का प्रावधान है। केंद्र ने पिछले वर्ष राज्यों को इसके लिए कहा था। इस वर्ष ऐसा नहीं किया। मुआवजा मिलना चाहिए। केंद्र क्षमतानुसार योजना बनाए।

जस्टिस भूषण: क्या इसे पूर्व अनुग्रह भुगतान 2015 के पत्र द्वारा कवर किया जा सकता है? 2015 की अधिसूचना लागू नहीं है तो 4 लाख के मुआवजे पर जोर नहीं दिया जा सकता।
एसबी उपाध्याय: हमारा केंद्र से अनुरोध है कि अधिसूचना का दायरा 2021 तक बढ़ाया जाए।
जस्टिस शाह : हर आपदा अलग है। आप यह नहीं कह सकते कि हर प्रकार की विपत्ति के लिए एक ही मानदंड लागू किया जा सकता है।
गौरव बंसल (याचिकाकर्ता ): केंद्र मुआवजे से मना नहीं कर सकता। इसकी योजना मौजूद है। वित्त आयोग भी जानता है कि लोगों को महामारी में रुपयों की जरूरत है। जब राज्य मुआवजा दे सकते हैं तो केंद्र क्यों नहीं दे सकता?
तुषार मेहता (सॉलिसिटर जनरल): अब आपदा में राहत की परिभाषा पहले से अलग है। पहले प्राकृतिक आपदा के बाद राहत की बात थी। अब आपदा से निपटने की तैयारी भी शामिल है।

जस्टिस भूषण: संसद ने 5 साल के लिए 15 हजार करोड़ राशि आवंटित की है। केंद्र या राज्य सरकार क्या इस राशि को बढ़ा नहीं सकते?
सॉलीसिटर जनरल: यह इतना आसान नहीं है। हमारा ध्यान तैयारियों और जागरूकता पर है।
जस्टिस भूषण: मृत्यु प्रमाण पत्र में मौत की सही वजह दर्ज न करने पर आपका क्या कहना है?
सॉलिसिटर जनरल: केंद्र ने हलफनामे में साफ किया है कि राज्यों को मृत्यु प्रमाण-पत्र पर मौत की सही वजह लिखने का निर्देश जारी किया गया है। वरना संबंधित पर कार्रवाई की जाएगी।

जस्टिस भूषण: हकीकत अलग है। प्रभावित व्यक्ति के लिए मदद पाना मुश्किल है। मृत्यु प्रमाण पत्र की बेहद जटिल प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिए। जिनके डेथ सर्टिफिकेट में कारण कोरोना नहीं लिखा गया है उनके लिए क्या किया जा सकता है, इस पर कोर्ट विचार करेगा।

सॉलिसिटर जनरल: प्रवासियों के लिए विशेष ट्रेनें चलाईं, गरीबों में राशन बांटा। 22 लाख हेल्थ वर्कर को बीमा दिया। सभी राहत के कदम हैं।
जस्टिस शाह: वर्ग 4 और स्वास्थ्य प्रतिष्ठान के सभी कर्मचारियों को कवर किया जाएगा?
सॉलीसिटर जनरल: श्मशान कर्मी इसमें कवर नहीं किए जाते। इस पर केंद्र विचार कर रहा है। हम न्यू इंडिया इन्श्योरेंस के माध्यम से एक योजना ला रहे हैं। प्रीमियम सरकार ही भरेगी।

जस्टिस भूषण: प्रीमियम भुगतान और मुआवजा अलग-अलग चीजें हैं। क्या राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने कोई निर्णय लिया है कि मुआवजा नहीं दिया जाएगा?
सॉलीसिटर जनरल ऐसी कोई सूचना नहीं है। ऐसा नहीं है कि सरकार के पास पैसा नहीं है। हमारा तर्क आपदा प्रबंधन से जुड़ी दूसरी चीजों के लिए धन का प्रयोग करने को लेकर है। कुछ राज्यों ने आपदा प्रबंधन अधिनियमों के तहत मुआवजे घोषित किए, मगर यह सीएम राहत कोष, आकस्मिक निधि आदि से दे रहे हैं।

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