भाजपा और सिंधिया के राजनैतिक महत्वकांक्षाओं ने लॉकडाउन होने में देरी करवाई, अब पूरा देश भूगत रहा है

  • प्रियांशु

कोरोना के बढ़ते प्रकोप से पूरा देश परेशान है। तमाम बड़े शहरों से छोटे गांवों तक के लोग दिन प्रतिदिन मौत का मंजर देख रहे है। लोगो में डर का माहौल है। वो अपने घरों में बंद है ताकि खुद को बचाया जा सके. स्वास्थ्य विभाग के पंडितों का मानना है कि भारत में लॉक डाउन एक सप्ताह पहले लाना चाहिए था. यदि हम 7-8 दिन पहले पूरे देश को बंद करके बॉर्डर सील कर दिए होते तो मौत का आंकड़ा इस प्रकार से आसमान नहीं छूता।

इन सबके पीछे की वजह क्या है ? ऐसे कई वजहें हो सकती है जो मुख्य रूप से जिम्मेदार है कोरोना के बढ़ते प्रभाव के लिए। जैसे लॉक डाउन में विलंबता, निजामुद्दीन मरकज के जमाती, विदेश से प्लानों में भरकर लाए गए लोग अथवा सोसल डिस्टेसिंग की धज्जियां उड़ाने वाले लोग और संक्रमित मरीजों द्वारा कि गई बेवकूफी। इसके अलावा भी एक वजह है, जो शायद सबसे बड़ी वजह है।

इसके लिए आप इन तारीखों पर गौर कीजिए: पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतरादित्य सिंधिया ने सबसे पहले 7 मार्च को 22 विधायकों को मध्यप्रदेश से निकालकर कर्नाटका पहुंचा दिया और फिर 9 मार्च को कांग्रेस से अपना इस्तीफ़ा दे दिया जिसे उन्होंने 10 मार्च को अपने सोसल मीडिया के माध्यम से एक चिट्ठी के जरिए सार्वजनिक किया। उस समय तक देश में कोरोना के 39 मरीज सामने आ चुके थे और ये बहुत बड़े संकट की चेतावनी थी क्योंकि दुनिया भर में आंकड़ों के लिहाज से 1 लाख से ज्यादा लोग कोरोना कि चपेट में आ चुके थे।

10 मार्च से 20 मार्च तक विधायकों को खरीदने का खेल चलता रहा और मीडिया कोरोना रिपोर्ट्स पर लोगो को आगाह करने की बजाए ज्योतिरादित्य सिंधिया की जीवन गाथा सुना सुना कर टीआरपी बटोरती रही। ऐसे में 20 मार्च तक चले इस घटनाक्रम के बाद अपने 22 विधायकों को भाजपा द्वारा खरीद लिए जाने के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने गवर्नर के समक्ष अपना इस्तीफा दे दिया, शिवराज को मुख्यमंत्री का पद मिल गया और सिंधिया राज्यसभा चले गए। और तबतक मामले 39 से बढ़कर 250 पहुंच गए थे।

बहरहाल, इस्तीफे के अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने ‘जनता कर्फ्यू’ का ऐलान कर दिया और जनता कर्फ्यू के तुरंत अगले दिन सरकार ने पूरे देश में 21 दिनों का सम्पूर्ण लॉकडाउन लगा दिया। हालांकि, लॉक डाउन लगाने के बावजूद शिवराज सिंह चौहान को सैकड़ों विधायकोंं के साथ प्रदेश में नई सरकार का गठन कर शपथ ग्रहण करते हुए भी देखा गया।

अब सवाल उठना लाज़िम है कि जब हिंदुस्तान को पहला कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ मिला तो उसके बाद उसने स्थिति को गंभीरता से क्यों नहीं लिया। मामला जब 100 के पार पहुंच गया फिर भी गृह मंत्री जी क्यों विधायकों की बोली लगाने में व्यस्त रहे? ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीतिक मह्वाकांक्षा ने हिन्दुस्तानियों को क्यों इतने बड़े संकट में धकेल दिया? यदि हम 7-8 दिन पहले पूरे देश को बंद करके बॉर्डर सील कर दिए होते तो मौत का आंकड़ा इस प्रकार से आसमान नहीं छूता।

आपको बता दें कि सिंधिया खेमे के जो 22 विधायक मध्यप्रदेश से निकालकर कर्नाटक पहुंचाए गए थे उसमें से 6 मंत्री थे। स्वास्थ मंत्री तुलसीराम सिलावट भी इसी दल में मौजूद थे। मध्यप्रदेश इस समय देश का एकलौता ऐसा राज्य है जहां न तो स्वास्थ मंत्री है और न ही मंत्रिमंडल का गठन हुआ है। जिसके कारण बाकी राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश सरकार कोरोना को रोकने में पूरी तरह नाकामयाब हुई है। प्रदेश के दो प्रमुख शहर इंदौर और भोपाल में हालात दिन-प्रतिदिन बेकाबू होते जा रहे है और इसके लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, दोनो रुप से कहीं न कहीं भाजपा नेता ज्यातिरादित्य सिंधिया भी जिम्मेदार हैं।

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