चंद्रशेखर हत्याकांड में पटना हाईकोर्ट का फैसला, हत्यारों की उम्र कैद की सजा बहाल रहेगी

PATNA पटना हाईकोर्ट से खबर आई है । चंद्रशेखर के हत्यारों की उम्र कैद की सजा बहाल रहेगी । 1997 की बात है । सिवान में “सुपर सरकार” चलती थी तब । इस सरकार से “हम भारत के लोग” सहमे रहते थे । जिंदा रहने के लिए दरबों में दुबके रहना था । दिल्ली से एक लड़का आया । कौशल्या का बेटा ! राम तो नहीं लेकिन राम जैसा ही था – चंद्रशेखर । रामराज की बातें करता । लोगों को समझाता कि जिंदा कौमें दरबों में नहीं दुबकतीं । प्रतिरोध करती हैं । सुगबुगाहट होने लगी थी । लोग साथ आने लगे थे । “सुपर सरकार” को बुरा लगा । ‘कौशल्या के राम’ चंद्रशेखर की हत्या हो गई । जागता हुआ सिवान चिरनिद्रा में सो गया ।

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हत्याएं रोज होती थीं । लेकिन चंद्रशेखर की हत्या से सिवान सिहर गया था । लोग जिंदा रहने के लिये पलायन करने लगे । दुआओं में प्रार्थना करते कि हमारे राजेन्द्र और मजहरुल को फिर से लौटा दो ईश्वर ! ईश्वर ने नहीं सुनी । सिवान अपना भगवान बदल चुका था । घर की दीवारों पर राजेन्द्र और मजहरुल धूल फांक रहे थे । चमचमाते शीशे के पीछे से “सुपर सरकार के साहेब” मुस्कुरा रहे थे ।

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जालियांवाला बाग हत्याकांड को याद कीजिये । लोगों को पानी पिला रहे छोटे बच्चे उधम सिंह को याद कीजिये । मौत का खेल देखनेवाली उन आंखों की दहशत के बारे में सोचिये । कल्पना कीजिये कि 20 सालों तक कैसे उधम सिंह ने उस भयावह मंजर को अपने सीने में जिंदा रखा होगा ? कितनी ज्वाला दबी रही होगी उसके सीने में । ये ज्वाला उस दिन शांत हुई जिस दिन उधम की गोलियों से निकलकर डायर के जिगर को पार कर गई ।

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प्रथम विश्व युद्ध को याद कीजिये । युद्ध के बाद की संधि को याद कीजिये । 1919 वाली वर्साय की संधि । दबंगो ने सारा दोष पराजितों पर मढ़ दिया । उनके उपनिवेश छीन लिए । उनकी जहाजें छीन ली । आर्थिक और सामरिक रूप से विकलांग बनाकर छोड़ दिया । यहीं नही रुके । हर साल एक निश्चित रकम देने को विवश किया । इस घटना के बारे में सोच सोचकर वर्साय से कोसों दूर हिटलर आंसू बहा रहा था । 15 सालों के बाद उसे मौका मिला ।लोगों ने जर्मनी का चांसलर बनाया । सारे संधि पत्र जला दिए गये । एक मार दिया गया राष्ट्र फिर से खड़ा हो गया ।

अत्याचारी सत्ता कितनी भी ताकतवर हो, एक दिन ध्वस्त होती है । सिवान में भी हुई । निजाम बदला । निजाम का स्वरूप बदला । लोग मुखर हुए । “सुपर सरकार” का भौकाल तार-तार हुआ । सरकार की संस्थाएं मजबूत हुईं । भागे हुए लोग सिवान लौटने लगे ।

10 सालों में बिहार बदला है । सिवान भी बदला है । लोग घरों से निकलने लगे हैं । बिना डर के । सड़कें अच्छी हो गयी हैं । बिजली मिल रही है । शौचालय बनने लगे हैं । पानी की टंकियां लगने लगी हैं । 20 साल के बाद ही सही कौशल्या और चंदा बाबू जैसे “हम भारत के लोगों” को न्याय मिलने की आस जगी है ।

दुनिया भी बदली है । जालियांवाला बाग हत्याकांड के दोषियों के उत्तराधिकारियों ने खेद जताया है । वर्षाय की संधि के लुटेरों ने यह मान लिया है कि अगर ये अपमानजनक संधि नहीं होती तो द्वितीय विश्व युद्ध नहीं होता । आश्चर्य है कि दशकों तक सिवान को आतंक और दहशत का पर्याय बना देनेवाले “सुपर सरकार के साहेबों” ने अपनी दहशतगर्दी और अराजकता के लिए खेद तक व्यक्त नहीं किया है ।

लोकतंत्र की वाहवाही इसी में है कि किसी चंदा बाबू की उम्मीद न टूटे । कोई कौशल्या यह न मान बैठे कि उसके राम को इंसाफ नहीं मिलेगा । दुआ कीजिये कि यह उम्मीद जिंदा रहे । क्योंकि जिंदा रहने के लिये उम्मीद की खुराक भी अमृत से कम नहीं है प्रभु !

लेखक : संजय सिंह, सिवान

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