कोरोना से जंग हार गया बिहार का बाहुबली शहाबुद्दीन, साहब से थरथराते थे लोग, जेल से चलता था राज

अभी अभी एक बड़ी खबर सामने आ रही है बताया जा रहा है कि बिहार के बाहुबली नेता और राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन का कोरोना से निधन हो गया है। दीन दयाल अस्पताल में इलाज के दौरान हुई है मौत। कोरोना से संक्रमित थे शहाबुद्दीन।

पटना। बिहार में राजद के शासन में पूर्व सांसद शहाबुद्दीन खौफ का दूसरा नाम हुआ करते थे। लोग इनसे थर्राते थे।लेकिन बिहार के डॉन और आतंक के पर्याय रहे मोहम्मद शहाबुद्दीन अर्थात साहब का जलवा ऐसा था कि पूछिए मत। सीवान में आज भी लोग नाम लेकर नहीं पुकारते। जेल में बंद होने बावजूद उनका खौफ लोगों पर भारी है और उनकी पहचान साहब की बनी हुई है। बीते करीब 27 सालों से ऐसा ही हो रहा है।

शहाबुद्दीन का जन्म बिहार के सीवान जिले के प्रतापपुर में 10 मई 1967 को हुआ था। कॉलेज के दिनों से ही इनकी दबंगई के चर्चे आम थे। महज 21 साल की उम्र में शहाबुद्दीन के खिलाफ सीवान के एक थाने में पहला मामला दर्ज हुआ था। देखते ही देखते शहाबुद्दीन सीवान के मोस्ट वांटेड क्रिमिनल बन गए। शहाबुद्दीन पर उम्र से भी ज्यादा 56 मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से 6 में उन्हें सजा हो चुकी है। भाकपा माले के कार्यकर्ता छोटेलाल गुप्ता के अपहरण व हत्या के मामले में वह आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं।

1986 में पहली प्राथमिकी दर्ज
निशानेबाज शहाबुद्दीन का सियासी सफर शुरू होने से काफी पहले दबंगई की शुरुआत हो गई थी। रिकॉर्ड के मुताबिक उन पर पहली प्राथमिकी 1986 में सीवान जिले के हुसैनगंज थाने में दर्ज हुई थी। उसके बाद तो उनकी छवि ऐसी बनी कि लोग सरेराह उनका नाम लेना भी मुनासिब नहीं समझते हैं। चुनाव लड़ने के दौरान सीवान शहर में शहाबुद्दीन की पार्टी को छोड़कर दूसरे किसी प्रत्याशी का झंडा लगाने की हिम्मत किसी को नहीं होती थी। शहाबुद्दीन पर हत्या, अपहरण और हत्या रंगदारी के दर्जनों मुकदमें जुड़ते गये।

1990 में पहुंचे विधानसभा
सीवान जिले के जिरादेई विधानसभा से वह पहली बार जनता दल के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। तब वह सबसे कम उम्र के जनप्रतिनिधि थे। दोबारा उसी सीट से 1995 में चुनाव में जीत दर्ज की। 1996 में वह पहली बार सीवान से लोकसभा के लिए चुने गए। एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें गृह राज्य मंत्री बनाए जाने की बात चर्चा में ही आई थी कि मीडिया में शहाबुद्दीन के आपराधिक रिकॉर्ड की खबरें छपीं। इस प्रकार उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने का मामला पीछे रह गया।

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