PM मोदी की गलत नीतियों से बर्बाद हो रहा देश, अर्थव्यवस्था के सामने इधर कुआं उधर खाई जैसी स्थिति

मोदी सरकार की गलत आर्थिक नीतियो ओर गलत निर्णयों का परिणाम है कि आज देश की अर्थव्यवस्था के सामने इधर कुआं उधर खाई जैसी स्थिति पैदा हो गई है.

कल वित्तमंत्री ने भरी हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से मिले फंड को कैसे खर्च किया जाएगा, इसका निर्णय अभी नहीं लिया गया है. लेकिन सब जानते है कि यह सिर्फ दिखावा है अंदर ही अंदर यह निर्णय बहुत पहले लिया जा चुका है कि इस बड़ी राशि को किस मद में लगाया जाएगा.

कल ही कोटक इक्विटीज ने इस सरप्लस फंड को सरकार को ट्रांसफर किये जाने की असली वजह का खुलासा किया है रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘सरकार को वित्त वर्ष 2019-20 के बजट अनुमानों की तुलना में आरबीआई से 58,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिलेंगे. इससे जीएसटी राजस्व में होने वाली 1,500 अरब रुपये की कमी को भरने में कुछ मदद मिलेगी, लेकिन कमजोर कर राजस्व के कारण सरकार के खजाने पर दवाब बना रहेगा.’ सरकार को केवल मामूली राहत मिलेगी, जबकि GST राजस्व में कमी के कारण वित्तीय घाटे को लक्ष्य के अंदर रखना मुश्किल होगा.

यानी साफ है कि दोषपूर्ण टैक्स व्यवस्था जीएसटी के कारण इनडायरेक्ट टैक्स कलेक्शन पर विपरीत असर पड़ा है देश में सरकारी वित्त का प्रबंधन कठिन होता जा रहा है क्योंकि राजस्व संग्रह कम है और व्यय प्रतिबद्धताएं बहुत अधिक हैं। इसी कारण एक बड़ा गैप पैदा हुआ जिसे इस बड़ी रकम से भरे जाने की जरुरत महसूस की जा रही हैं

इसके अलावा इस वर्ष जो टैक्स कलेक्शन के लक्ष्य दिए गए हैं वह इस रुके हुए जीएसटी कलेक्शन से पूरे होने वाले नही है गत वित्त वर्ष में कुल राजस्व सकल घरेलू उत्पाद के एक फीसदी तक कम रहा। हालांकि केंद्रीय बजट में इस तथ्य को जनता से छिपाने का प्रयास किया गया। यह कमी पूरी तरह जीएसटी के कारण रही जो गत वर्ष के बजट अनुमान से कम संग्रह कर सका।

CAG ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात को स्वीकार किया है कि जीएसटी लागू होने के पहले साल के दौरान कर संग्रह सुस्त रहा। अपने इस बात की पुष्टि करने के लिए सीएजी ने कहा कि केंद्र सरकार का अप्रत्यक्ष कर संग्रह 2017-18 में सुस्त होकर 5.80 प्रतिशत रह गया, जो 2016-17 में 21.33 प्रतिशत था।

हालात अब तो इतने बिगड़ चुके हैं कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य रथिन रॉय सरकार से अनुरोध किया कि मध्यावधि राजकोषीय खाके को लेकर एक श्वेत पत्र जारी किया जाए। उनका मानना है कि 2019-20 के लिए बजट में निर्धारित कर संग्रह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है रॉय ने कहा, ‘मेरे पेशेगत फैसले के हिसाब से आप उतना कर संग्रह करने में सक्षम नहीं होंगे, जितना 2019-20 के बजट मेंं अनुमान लगाया गया है। ऐसे में या तो आपको और ज्यादा उधारी लेनी पड़ेगी, या आपको खर्च में कमी करनी होगी।’ उन्होंने आगे कहा, ‘अगर आप ज्यादा उधारी लेते हैं तो इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, या अगर आप कम खर्च करते हैं तो उसका भी असर होगा।’

यह इधर कुआ उधर खाई वाली स्थिति है यही स्थिति तब भी पैदा हो रही है जब सरकार वस्तुओं से जीएसटी की दरें कम करने की बात करती है तो भी मुश्किल है. समस्या यह है कि सरकार यह कहती है कि दरों में कटौती आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए की गई है तो वह बढ़ोतरी कहां है?उपभोग कहाँ बढ रहा है? , माँग क्यो नही पैदा हो रही? कारोबारियों में उत्साह की भावना क्यों नहीं नजर आ रही है? अगर लोगों के पास इतनी अधिक धनराशि है तो खपत में इजाफा क्यों नहीं आ रहा है और निवेश बढ़ता हुआ क्यों नहीं दिख रहा?

यानी ऐसी स्थिति है कि यदि जीएसटी की दरें कम की जाती है तो भी नुकसान है और बढ़ती है तो भी नुकसान है. जीएसटी अब ऐसा भंवर बन गया है कि जिससे निकल पाना अब असम्भव लग रहा है और यह सब मोदी सरकार की बिना सोचे समझे बेहद जल्दबाजी में GST लागू कर देने का नतीजा है.

-Girish Malviya

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