यह नया हिंदुस्तान है…यहां भीड़ का राज है, कोई रोकने वाला नहीं है

यह नया हिंदुस्तान है. यहां भीड़ किसी को मा’रकर मु’र्दा बना देती है. फिर मु’र्दे पर मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है और ह’त्या के आ’रोपियों को छोड़ दिया जाता है. फिर कोई मंत्री उन्हें माला पहना देता है. कोई उन्हें भगत सिंह के वारिस बता देता है. कोई उनके लिए पैसे खर्च करता है. कोई उन्हें ‘न्याय’ दिलाने का भरोसा देता है. कोई मौन रहकर इस सबको समर्थन देता है.

बस अकेला पड़ता है तो वह म’रने वाले का परिवार. जिसे न्याय का भरोसा और साथ मिलना चाहिए, वह अंतिम उम्मीद भी छोड़ देता है. जिस राजस्थान में लिं’चिंग में मा’रे गए पहलू खान पर चा’र्जशीट फाइल हुई थी, उसी राजस्थान में एक पिता रतिराम, जो कि नेत्रहीन थे, आंख पर पट्टी बांधी हुई न्याय की देवी से निराश हो गए और सल्फास खाकर जिंदगी खत्म कर ली.

करीब डेढ़ महीने पहले जब पहलू खान मामले में सामने आया पुलिस ने चार्जशीट फाइल की है और उसमें भीड़ के हाथों मा’रे गए पहलू खान को भी दो’षी बताया है तो ह’ल्ला मचा. इस पर गहलोत ने कहा कि फिर से जांच कराएंगे. फिर सभी छह आ’रोपियों को अदालत ने छोड़ दिया, क्योंकि पुलिस ने कोई सबूत ही पेश नहीं किया, तब फिर गहलोत ने कहा कि जांच कराएंगे. मतलब अभी तक पुलिस जांच नहीं कर रही थी, आइस पाइस खेल रही थी.

एक तरफ न्याय का यह हाल है, दूसरी तरफ मॉब लिं’चिंग जारी है. अगस्त के पहले हफ्ते में बिहार में 15 दिन में मॉब लिं’चिंग की 12 घटनाएं हो चुकी हैं. बेखौफ भीड़ के न्याय का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है.

पहली ह’त्या इस शक के आधार पर हुई थी घर में जो खाना पका है वह गाय का मांस है. दूसरी हत्या हुई जब किसान अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए नई गाय खरीद कर ला रहा था. तीसरी ह’त्या हुई जब एक व्यापारी खरीदी गायों को बेचने जा रहा था. चौथी ह’त्या तब हुई जब चमड़े का कारोबारी ट्रक में चमड़े ले जा रहा था. पांचवीं, छठवीं, सातवीं…. सिलसिला चल निकला.

कबीलों, चरवाहों, गड़रियों और सपेरों के देश में लोगों ने गायों को साथ लेकर आना-जाना छोड़ दिया. अब किसी गैरहिंदू के लिए गाय का साथ जान गंवाने की गारंटी हो गया. गोवंशीय पशुओं का व्यापार बंद हो गया. अब यह व्यापार सिर्फ लाइसेंसी कंपनियां करने लगीं.

यह सब तब हो रहा था जब हिंदुस्तान दुनिया में बीफ निर्यात का कीर्तिमान कायम कर रहा था. बीफ निर्यात पर सवर्ण हिंदुओं का कब्जा था, सो और पुख्ता हो गया.

गाय समेत तमाम पालतू जानवर सदियों से हिंदुस्तानियों की जिंदगी में ऐसे मौजूद थे जैसे चेहरे के बीचोबीच नाक मौजूद रहती है. गए जमाने में मुंशी प्रेमचंद का होरी एक गाय के सपने के साथ मर सकता था. मगर अब वह गाय का सपना तभी देख सकता है जब वह गोरक्षकों से प्रमाणपत्र प्राप्त हिंदू हो.

गाय के पीछे अचानक हत्यारे गोरक्षा दल आए और गोपालकों के दिन लद गए. हत्यारों को हत्या का लाइसेंस मिल गया. सरकार ने कातिलों को माला पहनाया. मुर्दों पर मुकदमा दर्ज हुआ. चौतरफा खौफ तारी हुआ.

अवाम में डर फैलने लगा कि सरकार बहादुर अन्याय कर रही है. वह भीड़ को शह दे रही है. भीड़ खुद को अदालत समझ रही है. अदालत के बाहर लोगों की हत्याएं हो रही हैं.

विपक्षी सियासतदानों ने सरकार को क्रूर और अन्यायी कहा. वे बोले हम सरकार में आएंगे तो न्याय करेंगे. समय गुजरा, कुछ सूबों के चुनाव हुए और गांधी का बोझ ​लादे विपक्षी सत्ता में आ गए.

फिर मुर्दों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट जमा हुई. जो संभावित ह’त्यारे थे वे छोड़ दिए गए और ह’त्या किसने की, यह रहस्य बन गया. जिन्हें भीड़ ने पी’टकर मारा था, पुलिस ने उन्हें भीड़ के हाथों पि’टकर मर जाने के जुर्म में दोषी पाया.

लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई है. जु’ल्म की कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं.

-Krishna Kant

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