अर्घ्य देते मुस्लिम श्रद्धालू का फोटो वायरल, छठ पर नहीं दिखता जात-पात और धार्मिक भेदभाव

नई दिल्ली. बिहार और झारखंड के घाटों पर छठव्रती पहुंच चुके हैं. छठ गीतों की वजह से अद्भुत समां चारों ओर पसरा है. वातावरण भक्तिमय हो चला है. घाटों तक पहुंचने वाली गलियां साफ-सुथरी और लाइटों से सजी हैं. सड़कें धुली-धुली सी हैं. नदी तालाबों में उतर कर छठव्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दे रहे हैं.

यह नजारा बिहार-झारखंड समेत पूर्वांचल के सभी राज्यों में दिख रहा है. मुंबई और विदेशों से भी खबर है कि इस महापर्व को लोग धूमधाम से मना रहे हैं. इस बार की छठ में खास बात यह दिख रही है कि अधिकतर चेहरे पर मास्क लगे हैं. छठघाटों पर पिछले सालों के मुकाबले इस बार भीड़ थोड़ी कम है. कई घाटों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए लोग दिख रहे हैं. कुछ घाट ऐसे हैं जहां लोग इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं.

इस पर्व की एक बड़ी खासियत यह है कि इसकी पूजा में काम आनेवाली चीजें विशुद्ध रूप से प्राकृतिक होती हैं. सामाजिक रूप की बात करें तो इस पूजा में दिखावा नाम की चीज हो ही नहीं सकती. चाहे गरीब की पूजा हो या अमीर की – पूजन सामग्री प्रकृति के प्रति आभार जताने वाली होती है. कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए इस बार कई छठव्रतियों ने अपने घर की छतों पर ही इसका आयोजन किया है.

आपको ध्यान दिला दें कि यह एकमात्र ऐसा पर्व है जहां सूर्य को दीया दिखाया जाता है. दरअसल यह दीया दिखाना उस सूर्य के प्रति कृतज्ञता दिखाना है, जो हमारे जीवन में उजियारा फैलाता है. हमारे लोक की जुबानी परंपरा में यह बात अक्सर कही जाती है कि डूबते हुए सूर्य की पूजा कोई नहीं करता. पर छठ का यह महापर्व इस बात को झुठलाता है. यह पर्व यह बताता है कि हमारा समाज उदीयमान सूर्य का जितना सम्मान करता है, वही कृतज्ञयता और वही सम्मान उसके मन में अस्ताचलगामी सूर्य का भी है. तो प्रकृति की पूजा का यह महापर्व अपने तीसरे दिन अब अपने चरम पर है. कल सुबह के अर्घ्य के साथ छठ महापर्व संपन्न हो जाएगा.

बिहार और झारखंड के घाटों पर छठव्रती पहुंच चुके हैं. छठ गीतों की वजह से अद्भुत समां चारों ओर पसरा है. वातावरण भक्तिमय हो चला है. घाटों तक पहुंचने वाली गलियां साफ-सुथरी और लाइटों से सजी हैं. सड़कें धुली-धुली सी हैं. नदी तालाबों में उतर कर छठव्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दे रहे हैं.

यह नजारा बिहार-झारखंड समेत पूर्वांचल के सभी राज्यों में दिख रहा है. मुंबई और विदेशों से भी खबर है कि इस महापर्व को लोग धूमधाम से मना रहे हैं. इस बार की छठ में खास बात यह दिख रही है कि अधिकतर चेहरे पर मास्क लगे हैं. छठघाटों पर पिछले सालों के मुकाबले इस बार भीड़ थोड़ी कम है. कई घाटों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए लोग दिख रहे हैं. कुछ घाट ऐसे हैं जहां लोग इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं.

इस पर्व की एक बड़ी खासियत यह है कि इसकी पूजा में काम आनेवाली चीजें विशुद्ध रूप से प्राकृतिक होती हैं. सामाजिक रूप की बात करें तो इस पूजा में दिखावा नाम की चीज हो ही नहीं सकती. चाहे गरीब की पूजा हो या अमीर की – पूजन सामग्री प्रकृति के प्रति आभार जताने वाली होती है. कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए इस बार कई छठव्रतियों ने अपने घर की छतों पर ही इसका आयोजन किया है.

आपको ध्यान दिला दें कि यह एकमात्र ऐसा पर्व है जहां सूर्य को दीया दिखाया जाता है. दरअसल यह दीया दिखाना उस सूर्य के प्रति कृतज्ञता दिखाना है, जो हमारे जीवन में उजियारा फैलाता है. हमारे लोक की जुबानी परंपरा में यह बात अक्सर कही जाती है कि डूबते हुए सूर्य की पूजा कोई नहीं करता. पर छठ का यह महापर्व इस बात को झुठलाता है. यह पर्व यह बताता है कि हमारा समाज उदीयमान सूर्य का जितना सम्मान करता है, वही कृतज्ञयता और वही सम्मान उसके मन में अस्ताचलगामी सूर्य का भी है. तो प्रकृति की पूजा का यह महापर्व अपने तीसरे दिन अब अपने चरम पर है. कल सुबह के अर्घ्य के साथ छठ महापर्व संपन्न हो जाएगा.

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