17 सितम्बर को मनेगा विश्वकर्मा पूजा, जानिये भगवान विष्णु और विश्वकर्मा की रोचक कथा

सृष्टि के समस्त देवताओं में भगवान विश्वकर्मा को वास्तुशास्त्र और तकनीकी ज्ञान का जनक माना जाता है. प्रतिवर्ष भगवान विश्वकर्मा की जयंती 17 सितंबर को धूमधाम से मनायी जाती है. मुख्यत: व्यापारिक प्रतिष्ठान, कल-कारखानों में विधिवत पूजा की जाती है, ताकि देव शिल्पी की असीम अनुकंपा बनी रहे.

ऋग्वेद के 10वें अध्याय के 121वें सूक्त में लिखा है- विश्वकर्मा जी के द्वारा ही धरती, आकाश और जल की रचना की गयी. विश्वकर्मा पुराण के अनुसार, आदि नारायण ने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना की. कहते हैं कि उन्होंने ही देवताओं के घर, नगर, अस्त्र-शस्त्र आदि का निर्माण किया था.

ओडिशा का विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर तो विश्वकर्मा के शिल्प कौशल का अप्रतिम उदाहरण माना जाता है. विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जगन्नाथ मंदिर की अनुपम शिल्प रचना से खुश होकर भगवान विष्णु ने उन्हें ‘शिल्पावतार’ के रूप में सम्मानित किया था.

पौराणिक कथा अनुसार, माता पार्वती की इच्छा पर भगवान शिव ने एक स्वर्ण महल के निर्माण की जिम्मेदारी विश्वकर्मा को दी. महल की पूजा के लिए भगवान शिव ने रावण का बुलाया, लेकिन रावण महल को देख इतना मंत्रमुग्ध हुआ कि उसने दक्षिणा स्वरूप महल ही मांग लिया. भगवान शिव रावण को महल सौंप कर कैलाश पर्वत चले गये.

भगवान विश्वकर्मा ने पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ नगर, कौरव वंश के लिए हस्तिनापुर और भगवान कृष्ण के द्वारका का निर्माण भी किया. विश्वकर्मा पूजा प्रात: मूर्ति या प्रतिमा स्थापित कर विधिवत करें और प्रसाद का वितरण करें.

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